डॉ बी. आर. अंबेडकर का योगदान,याद रखेगा हिंदुस्तान
डॉ बी. आर.अंबेडकर का योगदान,याद रखेगा हिंदुस्तान
अंबेडकर जयंती प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को देश के संविधान निर्माता , भारत रत्न, प्रथम कानून मंत्री,दलितों के मसीहा, बोधिसत्व,न्यायविद, अर्थशास्त्री, विद्वान, दार्शनिक,समाजसेवी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। भारतीय संविधान का जिक्र जैसे ही आता हैं डा अंबेडकर का भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी अहम भूमिका के लिए याद किया जाता हैं।गैर बराबरी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले योद्धा के रूप में उनको याद किया जाता हैं। इन दोनों ही रूपों में डॉक्टर अंबेडकर की बेमिसाल भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता. लेकिन डॉक्टर अंबेडकर ने एक दिग्गज अर्थशास्त्री के तौर पर भी देश और दुनिया के पैमाने पर बेहद अहम योगदान दिया, जिसकी चर्चा कम ही होती है.डॉ अंबेडकर समाज सुधारक के साथ-साथ कुशल राजनीतिक और अर्थशास्त्री भी थे उनके उनके पास बीए, एमए, एम एस सी, पीएचडी, बैरिस्टर आदि के साथ कुल 32डिग्रियां थी तथा वे 9 भाषाओं के कुशल जानकार भी थे। बाबासाहेब आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1915 में अर्थशास्त्र से स्नाकोत्तर डिग्री प्राप्त किए और वहीं से 1917 में अर्थशास्त्र में ही पीएचडी की उपाधि प्राप्त किए। कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त करने के बाद लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से 1923 में पुनः डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त किए। दरसल अंबेडकर अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले प्रथम भारतीय थे। भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्या वित्तीय प्रणाली और रुपए मुद्रा पर उनके कई महत्वपूर्ण काम हैं। डॉक्टर अंबेडकर पढ़ने सोचने और लिखने में उनके पास अपार शक्ति का भंडार था। वे शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि ज्ञान की शक्ति ही व्यक्ति समाज राज्य और राष्ट्र को महान बनाती है। वे 18-18 घंटे अध्ययन करके ज्ञानार्जन प्राप्त करते थे।
डॉ बी आर अंबेडकर ने जमीनी स्तर पर आम आदमी को सर्वशक्तिमान बना दिया ।उन्होंने आत्मसम्मान ,स्वाभिमान को पहचान करा कर उसे अपनी शक्ति से अवगत कराया । मानसिक गुलामी से मुक्त कराया हक से जीना सिखाया उसके लिए संघर्ष का सत्याग्रह कर समाज में समता और न्याय की स्थापना निर्माण किया।डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर भारत के नव निर्माण के महान गौरव में से एक थे।लोकतंत्र और संविधान निर्माण करते समय एक आदर्श समाज बनाने के लिए लोकतांत्रिक शासन को अपनाया। इसके लिए उन्होंने एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य और उनकी एक मात्र कीमत का सिद्धांत दिया।
वित्त आयोग की स्थापना और डॉ.अंबेडकर
बाबासाहेब ने जो पीएचडी की उसके थीसिस के तौर पर केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों के बारे में जो तर्क और विचार पेश किए, उससे आजादी के बाद भारत में केंद्र और राज्यों के आर्थिक संबंधों का खाका तैयार किया गया। इस तरह भारत में वित्त आयोग के गठन का श्रेय बाबासाहेब और उनके थीसिस को जाता है।
रिजर्व बैंक की स्थापना और डॉक्टर अंबेडकर
1923 में बाबा साहेब की भारतीय मुद्रा और अर्थव्यवस्था से संबंधित एक पुस्तक आई जिसका नाम था “दी प्राब्लम आफ दी रुपी- इट्स ओरिजीन एंड इट्स सोल्यूशन”(रुपया का समस्या – इसके मूल और इसके समाधान) और इसी पुस्तक से शुरू हुई भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की कहानी। बैंक की कार्य पद्धति और इसका दृष्टिकोण बाबा साहब ने हिल्टन यंग कमीशन के सामने रखा जब 1926 में यह कमीशन भारत में रॉयल कमिशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस के नाम से आया था। तब इसके सभी सदस्यों ने बाबा साहेब की पुस्तक द प्रॉब्लम ऑफ रूपी – इट्स ओरिजन एंड इट्स सॉल्यूशन की वकालत की। फिर ब्रिटिशों की लेजिसलेटिव असेंबली ने इसे कानून का स्वरूप दिया और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 का नाम दिया। और इस तरह बाबासाहेब के योगदान के फल स्वरुप 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई।
डॉ.अंबेडकर और जलनीति
डॉ. अंबेडकर 20 जुलाई 1942 से लेकर 29 जून 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य थे। इसी दौरान बाबा साहब ने दामोदर नदी की भयानक स्थिति को देखते हुए दामोदर प्रकल्प के बारे में सोचा। इसी संदर्भ में दामोदर प्रकल्प पर 3 जनवरी 1945 को कोलकाता के सचिवालय में पहली बैठक हुई जिसमें बंगाल सरकार, बिहार सरकार और तत्कालीन केंद्रीय मध्यवर्ती सरकार के कई प्रतिनिधि शामिल हुए। डॉ. अंबेडकर ने दामोदर नदी प्रकल्प पर आधारित तीन परिषदों का नेतृत्व किया। इस परिषद में बाढ़ नियंत्रण और उसके सुरक्षा के बारे में क्या योजना होनी चाहिए, प्रकल्प के कारण नदी का नियंत्रण कैसा होना चाहिए, सूखे से कैसे निपटेंगे, विद्युत निर्माण कैसे किया जाएगा, इन विषयों पर डॉ. अंबेडकर ने विस्तृत मार्गदर्शन किया था। इस तरह डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में डैम निर्माण की परियोजना ने अच्छी प्रगति की और 1945 में प्राथमिक अभियांत्रिकी खाका तैयार हुई और इसे मान्यता मिली।हिराकुंड बांध उड़ीसा के महा नदी पर स्थित है जो 25.8 किलोमीटर लंबा है। यह भारत के स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई पहली प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है। 1945 में श्रमिक सदस्य डॉ आंबेडकर की अध्यक्षता में बहुउद्देशीय उपयोग के लिए महानदी को नियंत्रित करने के संभावित लाभ को देखते हुए इसके लिए निर्णय लिया गया और इस तरह डॉ. अंबेडकर की आधारशिला से प्रेरित यह बांध 1957 में निर्मित हुई।डॉ. अंबेडकर ने इस इसी प्रकार जल नीति के तहत 1948 में भाखड़ा नांगल परियोजना शुरू की गई जो सिंधु और सतलज नदी पर बनाया गया है। जो 1968 में पूर्ण हुई। सोन नदी घाटी परियोजना आदि परियोजनाओं का संपूर्ण श्रेय डॉ. अंबेडकर को जाता है।
महिला सशक्तिकरण में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की महत्वपूर्ण भूमिका
डॉक्टर भीमराव आंंबेडकर महिला अधिकारों के बड़े पैरोकार थे।भीमराव अंबेडकर अपने दौर के सबसे बड़े विद्वान थे। उन्होंने महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए संविधान में कई प्रावधान किए। उनका कहना था कि ‘मैं किसी समाज की तरक्की इस बात से देखता हूं कि वहां महिलाओं ने कितनी तरक्की की है।’
भीमराव अम्बेडकर ने महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने हमेशा ही महिलाओं को समानता, शिक्षा, सम्मान, अधिकार और अपनी समर्थता को समझने पर जोर दिया। उनकी समाज में बराबरी के लिए कानून बनाया। उन्हें हर क्षेत्र में जगह मिल सके ऐसी व्यवस्था बनाई। हिन्दू कोड बिल लाकर उन्होंने महिलाओं को भरण-पोषण, तलाक, पति की हैसियत के हिसाब से खर्चे का अधिकार दिलाया। बाबा साहब ने भारतीय नारी को पुरुषों के मुकाबले बराबरी के अधिकार दिए हैं। भारतीय समाज में लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए उन्होंने बाकायदा संविधान में लिंग के आधार पर भेदभाव करने की मनाही का इंतजाम किया।कामकाजी महिलाएं 26 हफ्तों की मैटरनिटी लीव ले सकती हैं, जिसकी शुरुआत बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने ही की थी।महिलाओं को पिता और पति की संपत्ति में हिस्सेदारी देना, तलाक का अधिकार और बच्चे गोद लेने का अधिकार भी बाबा साहब ने ही उन्हें दिलाया।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारत के आधुनिक निर्माताओं में से एक माने जाते हैं। अम्बेडकर समानता को लेकर काफी प्रतिबद्ध थे।उनका कहना था कि प्रत्येक व्यक्ति को विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना किसी भी समाज की प्रथम और अंतिम नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जब तक आर्थिक और सामाजिक विषमता समाप्त नहीं होगी, तब तक जनतंत्र की स्थापना अपने वास्तविक स्वरूप को ग्रहण नहीं कर सकेगा।
🔵 गौतम बोंदरे (संपादक)