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 🌞सुबह🙏🏼सबेरे🌞          *विहंग*

🌞सुबह🙏🏼सबेरे🌞 *विहंग*

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 🌞सुबह🙏🏼सबेरे🌞
          *विहंग*
  (मनहरण घनाक्षरी)
दाना चुगने आती है,
बच्चों को ये खिलाती है,
अन्न - जल की खोज में,
         विहंग विचरती।
घास - फूस चुन - चुन,
घोंसले को बुन - बुन,
छत वृक्ष शखाओं में,
          बसेरा सँवारती।
मोबाइल - टॉवरों के,
निकलते तरंगों से,
भौतिकवाद मोह में,
         मनुज बिसारती।
जब - तक है जिंदगी,
मानव से है बंदगी,
आसरा नहीं बिगाड़ें,
        हाथ मैं पसारती।

 कुमार🙏🏼कारनिक
        "कुमार"
(छाल, रायगढ़, छग)
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