🌞सुबह🙏🏼सबेरे🌞 *विहंग*
25 मार्च 2021
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🌞सुबह🙏🏼सबेरे🌞
(मनहरण घनाक्षरी)
दाना चुगने आती है,
बच्चों को ये खिलाती है,
अन्न - जल की खोज में,
विहंग विचरती।
घास - फूस चुन - चुन,
घोंसले को बुन - बुन,
छत वृक्ष शखाओं में,
बसेरा सँवारती।
मोबाइल - टॉवरों के,
निकलते तरंगों से,
भौतिकवाद मोह में,
मनुज बिसारती।
जब - तक है जिंदगी,
मानव से है बंदगी,
आसरा नहीं बिगाड़ें,
हाथ मैं पसारती।
कुमार🙏🏼कारनिक
"कुमार"
(छाल, रायगढ़, छग)
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