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🌹जानिए अदालत में गवाह के मुकरने पर क्या होता है?🌹 By Sarvesh Vishwakarma Advocate

🌹जानिए अदालत में गवाह के मुकरने पर क्या होता है?🌹 By Sarvesh Vishwakarma Advocate

🌹जानिए अदालत में गवाह के मुकरने पर क्या होता है?🌹 By Sarvesh Vishwakarma Advocate 
अगर अदालत में गवाह गवाही देने से मुकर जाये या फिर गवाह झूठी गवाही दे तो इसका परिणाम क्या होगा ? क्या अदालत झूठी गवाही देने वाले को सजा दे सकती है? गवाह की परिभाषा क्या है? 🌹पाठकों के लिए जनहित में लेख का प्रकाशन ---🌹

जानिए झूठी गवाही से कैसे बचें? | 

जब भी कोई अपराध या कोई कार्य होता है तो उस के दो पक्ष होते है पहला अपराध करने वाला (दोषी पक्ष) और दूसरा अपराध को सहने वाला (शिकायतकर्ता पक्ष)। अगर कोई तीसरा व्यक्ति उस घटना को देख रहा हो, या जनता हो, तो वो गवाह कहलाता है। पुलिस केस में उस गवाह का स्टेटमेंट सीआरपीसी की धारा 161 में रिकॉर्ड करती है। इसमें पुलिस गवाह के बयानों को सुन कर स्वयं लिखती है इस स्टेटमेंट पर गवाही देने वाले गवाह के हस्ताक्षर लेने जरूरी नहीं होते हैं तथा इसकी कॉपी भी उस गवाह को देने का कोई नियम भी नहीं है।

गवाही से मुकरने का मतलब -- 
अगर कोई गवाह पुलिस को अपनी सीआरपीसी धारा 161 में जो गवाही दे, और उसे कोर्ट में जा कर मुकर जाए, तो उसे मुकरने वाले गवाह यानी होस्टाइल विटनेस कहते हैं। अदालत के सामने पुलिस की कहानी को सपोर्ट न करने वाला गवाह होस्टाइल विटनेस होता है। पुलिस किसी को भी छानबीन के दौरान सरकारी गवाह बना सकती है। गवाह की सहमति से पुलिस सीआरपीसी की धारा-161 के तहत उसका बयान दर्ज करती है। धारा-161 के बयान में किसी गवाह के दस्तखत लिए जाने का प्रावधान नहीं है। हालांकि किसी गवाह के सामने पुलिस अगर कोई रिकवरी आदि करती है तो रिकवरी मेमो पर गवाह के दस्तखत लिए जाते हैं। अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है l

गवाह पर शक है तो मजिस्ट्रेट के सामने बयान | 
जानें, क्यों दर्ज किए जाते हैं धारा 164 के तहत बयान | 164 के बयान में क्या होता है
किसी गवाही के बारे में अगर पुलिस को शक होता है कि वह बाद में अपने बयान से मुकर सकता है तो उस गवाह का धारा-164 में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराया जाता है। (ऐसा ज्यादातर महिला अपराध में होता है) धारा-164 में बयान देने वाले का बाद में मुकरना आसान नहीं होता। वैसे इन तमाम बयानों के बाद भी ट्रायल कोर्ट के सामने दिया बयान ही मान्य बयान होता है और अदालत यह देखती है कि गवाह झूठ तो नहीं बोल रहा।

अगर अदालत को यह लगता है कि गवाह अदालत में सच्चाई बयान कर रहा है और वह बयान पुलिस के सामने दिए बयान से चाहे पूरी तरह मेल नहीं भी खा रहा हो, तो भी उस बयान को स्वीकार किया जाता है।

 झूठे गवाह के खिलाफ कार्यवाही |

झूठे गवाह के खिलाफ कार्यवाही के तीन चरण हैं (1) अगर कोर्ट को केस के किसी भी स्टेज पर ये लगे की गवाह शपथ लेकर झूठ बोल रहा है, तो वह उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कार्यवाही कर सकती है। ऐसे में अदालत सीआरपीसी की धारा 340 के अंतर्गत कार्यवाही करती है दूसरा (2) स्वयं शिकायतकर्ता को ये लगे कि उसका गवाह उसी के खिलाफ गवाही दे रहा है या फिर वो दोषी को बचाने के लिए कोई झूठ बोल रहा है तो वो शिकायतकर्ता कोर्ट और पुलिस दोनों की मदद से उस झूठे गवाह के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है तीसरा (3) स्वयं दोषी भी गवाह के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है अगर दोषी को लगे कि कोई गवाह उसे झूठा फंसाने के लिए या फिर शिकायतकर्ता की मदद करने के लिए उसके खिलाफ झूठी गवाही दे रहा है तो वो उस गवाह के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है ऐसा वो सर कोर्ट में ही शिकायत दे कर ऐसा कर सकता है। लेकिन उस गवाह को झूठा साबित करने का बोझ शिकायत करने वाले के ऊपर ही होता है। असल में होता यह है कि अगर कोई गवाह पुलिस या मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से मुकरे, तो उसे मुकरा हुआ गवाह माना जाता है। अगर कोई सरकारी गवाह मुकर जाए, तो सरकारी वकील उसके साथ जिरह करता है और सच्चाई निकालने की कोशिश करता है। लेकिन इस प्रक्रिया में अदालत यह देखती है कि कौन से ऐसे गवाह हैं, जिन्होंने जानबूझकर अदालत से सच्चाई छुपाई या फिर झूठ बोला। ऐसे गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-340 के तहत अदालत शिकायत करती है। ऐसे गवाह के खिलाफ अदालत में झूठा बयान देने के मामले में आईपीसी की धारा-193 के तहत मुकदमा चलाया जाता है।

धारा 193 आईपीसी के अंतर्गत उस व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाता है जो अपनी गवाही से मुकरा है या दोषी को बचा रहा है लेकिन इससे किसी को कोई सजा नहीं हुई है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 7 साल कैद की सजा का प्रावधान है।

धारा 340 सीआरपीसी क्या है | 

जब कोई गवाह किसी व्यक्ति विशेष को झूठे अपराध में सजा करवाने के लिए गवाही दे तो उसे इस धारा में सजा होती है या हो सकती है तो ऐसे गवाह को एस धारा में सजा दी जाती है। इस धारा में सजा की कोई सीमा नहीं है। अगर आप किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी झूठी गवाही देते हैं कि उसे फांसी हो जाये तो झूठ पकड़े जाने पर आप को इस धारा के अनुसार फांसी की सजा ही सुनाई जाएगी।

अब जानिए झूठी गवाही से कैसे बचें

अगर किसी भी वजह से आप अदालत में गवाह बन गए हैं, चाहे वो पुलिस का दबाव हो या फिर आप के किसी निजी का तथा बाद में आप वो गवाही नहीं देना चाहते हैं तो सबसे पहले अदालत का गवाही का नोटिस आने पर, आप उस अदालत में आवेदन लगा कर अपना नाम गवाही लिस्ट से हटवा सकते हैं या फिर और अगर इससे बात नहीं बने तो ऐसे में आप के लिए ये जरूरी हो कि गवाही देनी ही होगी तो आप किसी भी बात का सीधा जवाब नहीं दे कर ये कह कर बच सकते हैं कि आपको याद नहीं है/ कह नहीं सकते या फिर भूल गए। इन बातों को बहाना बना कर अगर आप गवाही देंगे तो कल को बात झूठी पाने पर भी आपके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होगी क्योंकि अगर आपकी याद्दाश्त कमजोर है तो ये किसी आपके झूठ बोलने में नहीं आता है।

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