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पुस्तक - "छंद कलश"साहित्यकार - संतोष मिरी 'हेम' प्रकाशक- अभिलाषा बेहार (सचिव) छ.ग. राजभाषा आयोगसंस्करण - 2025

पुस्तक - "छंद कलश"साहित्यकार - संतोष मिरी 'हेम' प्रकाशक- अभिलाषा बेहार (सचिव) छ.ग. राजभाषा आयोगसंस्करण - 2025



'छंद कलश' ह तेरा प्रकार के छंद विधा के दस्तावेज ए। छत्तीसगढ़ी भाषा के नवा पढ़इया-पड़हंता मन बर दस्तगीर हो सकत हे। ये किताब म किसिम-किसिम के छंद म रचना संजोए गय हे। उल्लाला, सोरठा, दोहा, रोला, चौपाई, सरसी, आल्हा, जयकारी, घनाक्षरी, बरवै, गीतिका, कुण्डलियाँ के समागम अइसे होय हे, जइसे बसंत रीतु के बड़ोरा म हरियर, लाल, पिवरा, रंग बिरंगी रतनारी फूल सकलाय हे। किताब के भाखा शक्कर म पागे शकरकंद कस गुरतुर हे, पढ़इया मन पन्ना एक ले सतासी तक एकेच बइठका म पढ़ डारही अउ छंद के मरम-महत्तम ल घलो समझ जाहीं। 
    संतोष मिरी जी अपन पहिलीच उल्लाला छंद म छत्तीसगढ़ महतारी के जस गाये हे, बानगी देखव-"एक नवंबर के हे बने, संगी हमरो राज जी। बाढ़त हावै देखव सब्बो, छत्तीसगढ़ ह आज जी। दुखियारी-भूखियारी दाई-ददा, भाई-बहिनी लोगन मन के पीरा ल देख के कोंवर अंतस के कवि 'हेम' जी कलम शीर्षक, म लिखत हें कि "पर पीरा के लेख, आज कलम ह नइ लिखे। दुक्ख-दरद ल देख, लिखाई मा नइ दिखे।" ऊर्जाधानी कोरबा के कोख ले निकले करिया हीरा के बखान दोहा छंद म लिखथे कि "अबड़ सुघर हे कोरबा, ऊर्जाधानी नाम। सबला देथे कोयला, करथे बढ़िया काम ।।" हमर संस्कृति, पुटु, गिनती बाढ़त हे, टेटका कस रंग, हमर संस्कार, अनपढ़ ददा, सुन्ना हे चौपाल, बेटी के बिहाव, कमिहा ओधे समारू शीर्षक घलो म दोहा छंद के सुघर आरो-सरेखा हे। चौपाई छंद म शहीद वीर नारायण जी के सुरता करे गय हे। अइसने चौपाई छंद के "छंद कलश" म अउ ठन रचना मउहा कस रग-रग ले सकलाय हे। गने-गने रोला छंद पाँच ठन रोल मॉडल हे। दूनों रोला छंद म हरियाली तिहार के अउ बरखा रानी के महत्ता ल बखाने गय हे। ग्यारा ठन सरसी छंद के बानगी घलो ए किताब म ठूलाय हे। बहुरिया के संस्कार म नवा जमाना के नंदावत नेम-धरम के चलागन ल बतियाय गय हे देखौ - कभू मुड़ी नइ ओहर ढांके, काय कहँव मैं गोठ। लफर-लफर आघू मा मारे, इंग्लिश बोलय पोठ।" गिने-गिने सार छंद के पंदरा छद्मंश म गाँव गोढ़र, रुख राई, होली अउ जड़कल्ला के गियानी दहरा हे। दूनों आल्हा छंद ह जगनिक कवि के सूरता करा देथे, यहीच छंद म छत्तीसगढ़‌ के बलिदानी राजा वीर बालकदास जी के कथा ह तन-मन म भुर्री भर देथे, की कइसे लुका के बैरी मन सतवादी राजा के हत्या करे गईस। 
     आघू पेज नं. चौसठ ले जयकारी छंद ज्ञान के जयकारा लगावत हे। मया के सिखोना, फेर ददा(पिता) का होथे, कइसे दुख-दरद ल सइ के परवार ल आघू बढ़ाथे, घाम ले बचाए बर बिरछा लगाये के उदीम हे, मनखे जात ल गरभ-गुमान बिसार के भले करम करे के सिखोना हे। मनहरण घनाक्षरी के दसो छंद ल पढ़ के मन झूमर जाथे। नानपन के सुरता करत लोको पायलट 'हेम' जी बीते समे के जिनगानी के गुजरे अल्हड़पन के मजेदार लकीर खीचे हे। बेटी के मया-दुलार, छत्तीसगढ़ के रोटी-पीठा, बंबरी रूख, सरसों के फूल शीर्षक ह छत्तीसगढ़ी चलागन के झाँकी देखाथे। बरवै छंद म तो दूए ठन गीत हे फेर दूनों ह कमती नइ हे "चलव गिरौद‌पुरी मेला" ह छत्तीसगढ़ के महान संत समाज सुधारक गुरु घासीदास के व्याग-तपस्या के सुरता कराथे। आये हे फागुन गीत तो रंग गुलाल अउ मस्ती के झाँकी देखाथे। अउ मउरे आमा, परसा डारा तो मनमोहना ये। मनमोहिनी सिंगार संग संजोग रस के छंद आय। आखिर पन्ना म दू ठन कुण्डलियाँ कुण्डली मार के बइठे है। कुण्डलियाँ म "दोहा रोला जोरि के, छै पद चौबीस मत" सूत्र के बराबर पालन किये गय हे। जात-पात छोड, कुण्डलिया मनखे-मनरखे बर सिखोना हे- बानगी देखव "मनखे-मनखे हे लड़त, देख बनाके जात। अपन ल बड़‌का कहे, करत हवँय उतपात ।। करत हवँय उत्पात, देख सब्बो ल लड़थे। कुमति भरे हे देह, रोज वो देख अकड़थे ।। कहत हवय संतोष, भरोसा नइये तन के। भरम भूत ला छोड़, मिलव सब बनके मनखे ।। छेवर म सवनाही बरखा के रूपरेखा है।
     "छंद कलश" जतन के पढ़े लाइक हे, छत्तीसगढ़ी के नान्ही-नान्ही आखर रसभरी अउ जोगनी-मोहिनी है। जघा - जघा रूपक अउ अनुप्रास अलंकार मिंझरे है। झोर-झोर, जात-पात, तन-मन जइसे शब्द के संजोग हे। भाषा शास्त्र, पिंगल शास्त्र, शब्द संयोजन, यति, गति, लघु, गुरु के पालन किये गय हे। किताब म एक दू जघा मात्रा अउ लय के खटका हे। संतोष मिरी जी रेलगाड़ी के बटन तो रोजे दबाथे, ऐसने अउ साहित्य के बटन ल दबा के आघू आवय साहित्य कलश के जोत बगराके, सबके हित- पिरीत के बात लिखेंय। अंत म - 
"छत्तीसगढ़ी आखर पात पुराइन, 
पुहुप पंखुनी बगरे। 
ऐसन माटी छत्तीसगढ़ के, 
कमल गुलाबी कहरे।"

समीक्ष्य पुस्तक - "छंद कलश" 
दिनाँक - 26.06.2026.
समीक्षक- हरप्रसाद 'निडर' 
जांजगीर (छ०ग०)
 मो-9826071023.

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