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  'Below Rate' टेंडरिंग का खेल: गुणवत्ता की बलि, भ्रष्टाचार  पर रोक लगाने की लिए जिला पंचायत सदस्य बिनोद भारद्वाज ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

'Below Rate' टेंडरिंग का खेल: गुणवत्ता की बलि, भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की लिए जिला पंचायत सदस्य बिनोद भारद्वाज ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र


 'Below Rate' टेंडरिंग का खेल: गुणवत्ता की बलि, भ्रष्टाचार  पर रोक लगाने की लिए जिला पंचायत सदस्य बिनोद भारद्वाज ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र



सारंगढ़-बिलाईगढ़ :- छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों के नाम पर चल रहे 'बिलो रेट' (Below Rate) टेंडरिंग के काले खेल के खिलाफ अब जनप्रतिनिधियों ने सीधे मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है ।सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला पंचायत सदस्य बिनोद भारद्वाज ने सीधे सूबे के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रदेश में हो रहे सरकारी निर्माण कार्यों की बदहाली का कच्चा चिट्ठा खोल दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कम दाम पर टेंडर हथियाने की होड़ ने प्रदेश के विकास कार्यों को पहली नजर में ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है।

मुख्यमंत्री से सीधी गुहार: "रोकिए यह बिलो रेट का तमाशा"



कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे गए इस तीखे पत्र में बिनोद भारद्वाज ने सीधे तौर पर व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है। उन्होंने मांग की है कि छत्तीसगढ़ में शासकीय निर्माण कार्यों में अत्यधिक 'BELOW RATE' टेंडर प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए और इसकी अधिकतम सीमा को ही समाप्त कर दिया जाए। पत्रकारिता के धरातल पर देखें तो यह मांग केवल एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि जनता की जेब पर डाका डालने वाली पूरी व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ी बगावत है।

तीन बिन्दुओं में समझिए पूरा 'महा-घोटाला'

जिला पंचायत सदस्य ने पत्र में तीन मुख्य बिंदुओं के जरिए इस पूरे सिंडिकेट और उससे होने वाले नुकसान को रेखांकित किया है:

एस्टीमेट से 20-30 प्रतिशत कम रेट पर खेल: अधिकारियों द्वारा नियमानुसार SOR (Schedule of Rates) की दर से एस्टीमेट तैयार किया जाता है, लेकिन ठेकेदारों द्वारा टेंडर हथियाने के लिए 20 से 30 प्रतिशत तक कम दर (Below Rate) डाल दी जाती है। विभाग इसे L1 (Lowest Bidder) मानकर तुरंत स्वीकृत कर देता है।

क्वालिटी से खुला समझौता: जब काम वास्तविक लागत से एक-तिहाई कम पैसे में अलॉट होगा, तो ठेकेदार अपनी जेब से पैसे नहीं लगाएगा। नतीजा यह होता है कि मात्र 1 साल के भीतर ही निर्माण कार्य पूरी तरह से धराशायी हो जाता है।

धरातल पर दम तोड़ती योजनाएं: कागजों पर चमकने वाली सरकार की योजनाएं जैसे ही धरातल पर पहुंचती हैं, घटिया सामग्री और भ्रष्टाचार की वजह से दम तोड़ देती हैं।

"वास्तविक लागत से कम में काम... यानी योजना का गला घोंटना"

बिनोद भारद्वाज ने अपने पत्र में बेहद बेबाक और कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखा है:

"यदि कोई निर्माण कार्य उसके वास्तविक लागत मूल्य से कम मूल्य पर (Below Rate) किया जाएगा, तो एक साधारण व्यक्ति भी यह भलीभांति समझ सकता है कि उस निर्माण कार्य की गुणवत्ता क्या होगी। फलस्वरूप, ऐसे निर्माण का कोई मतलब ही नहीं रह जाता।"

उन्होंने आगे सीधे सरकार और अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि वास्तविक लागत मूल्य से कम दर पर काम कराना सीधे तौर पर योजना का गला घोंटना है। इससे शासन और जनता दोनों को ऐसी अपूर्णीय क्षति हो रही है, जिसकी भरपाई नामुमकिन है।

सिस्टम पर बड़ा सवाल: क्या केवल कागजी आंकड़े चमकाना ही मकसद है?

इस पत्र के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब विभाग को पता है कि कोई भी पुल, सड़क या भवन एस्टीमेट से 30% कम में नहीं बन सकता, तो फिर ऐसे टेंडर्स को मंजूरी क्यों दी जाती है? क्या अधिकारियों को केवल यह दिखाना होता है कि उन्होंने सरकार का पैसा बचा लिया? हकीकत यह है कि वह 'बचा हुआ पैसा' बाद में उसी घटिया निर्माण को दोबारा सुधारने और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।

पत्र की प्रतिलिपि मुख्य सचिव (छ.ग. शासन, रायपुर) को भी भेजी गई है, जिससे यह साफ है कि इस मामले को केवल स्थानीय स्तर पर दबाया नहीं जा सकेगा। अब देखना यह है कि क्या मुख्यमंत्री इस गंभीर और संवेदनशील पत्र पर कड़ा संज्ञान लेते हुए इस 'बिलो रेट' के खेल को बंद करते हैं, या फिर छत्तीसगढ़ की जनता का पैसा इसी तरह घटिया निर्माण की नालियों में बहता रहेगा।

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