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मीठे संतरे, भारी तराज़ू

मीठे संतरे, भारी तराज़ू



अजय कुमार बियानी 
सेवानिवृत्त इंजीनियर

बाज़ार केवल सौदे का स्थान नहीं होता, वहाँ इंसानियत भी रोज़ अपना हिसाब लिखती है। कभी ग्राहक पैसे देकर सामान ले जाता है, तो कभी कोई अनजाने में किसी के जीवन में मिठास छोड़ जाता है। ऐसी ही एक छोटी-सी घटना हमें यह सिखाती है कि प्रेम और करुणा का मूल्य किसी तराज़ू से नहीं तौला जा सकता।
शहर के एक पुराने सब्ज़ी बाज़ार में एक वृद्धा रोज़ टोकरी भर संतरे लेकर बैठती थी। झुर्रियों से भरा चेहरा, थकी हुई आँखें, लेकिन होंठों पर हमेशा संतोष की मुस्कान। वह पूरे दिन ग्राहकों को मीठे संतरे बेचती, पर कभी खुद एक फाँक भी नहीं खाती।
रोज़ की तरह एक युवक वहाँ आता। वह संतरे खरीदता, फिर उनमें से एक संतरा निकालकर उसकी एक फाँक चखता और मुस्कुराते हुए कहता,
“अम्मा, यह संतरा तो कम मीठा लग रहा है, ज़रा आप भी चखिए।”
वृद्धा संतरे की फाँक खाकर कहती,
“अरे बेटा, बिल्कुल मीठा है।”
युवक बिना कोई बहस किए बाकी संतरे लेकर चला जाता। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा।
एक दिन युवक की पत्नी ने पूछा,
“जब तुम्हें पहले से पता है कि संतरे मीठे हैं, फिर हर बार यह नाटक क्यों करते हो?”
युवक मुस्कुराया और बोला,
“अम्मा सारे दिन संतरे बेचती हैं, लेकिन अपने लिए कभी एक संतरा नहीं रखतीं। अगर मैं ऐसा न करूँ तो शायद वह कभी संतरा न खाएँ। मेरी यही छोटी-सी तरकीब है।”
कुछ दिनों बाद पास बैठी सब्ज़ी बेचने वाली महिला ने वृद्धा से पूछा,
“तुम्हें पता है न कि वह लड़का बहाना करता है? और मैं देखती हूँ कि हर बार तुम उसके पलड़े में एक-दो संतरे ज़्यादा रख देती हो।”
वृद्धा की आँखें नम हो गईं। उसने शांत स्वर में कहा,
“बेटी, उसकी चख-चख संतरे के स्वाद के लिए नहीं होती। वह मुझे संतरा खिलाने आता है। और मैं भी समझती हूँ कि वह क्या करना चाहता है। इसलिए जब मैं संतरे तौलती हूँ, तो हाथ अपने आप थोड़ा और बढ़ जाता है। यह व्यापार नहीं, स्नेह का लेन-देन है।”
सब्ज़ी बेचने वाली कुछ पल तक मौन रही। उसे समझ आ गया कि जहाँ प्रेम होता है, वहाँ हिसाब-किताब पीछे छूट जाता है।
जीवन में ऐसे लोग कम होते हैं जो बिना किसी शोर के किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। वे दान का ढिंढोरा नहीं पीटते, उपकार का प्रदर्शन नहीं करते। उनका सुख इसी में होता है कि सामने वाले का मन भर जाए।
हमारे समाज में अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि देने वाला हमेशा धनवान होता है। जबकि सच यह है कि सबसे बड़ा दान धन से नहीं, भावना से होता है। एक संतरे की फाँक, एक रोटी का टुकड़ा, एक गिलास पानी, एक मीठा शब्द—यदि प्रेम से दिया जाए तो वह किसी बड़े उपहार से कम नहीं होता।
भारतीय संस्कृति ने सदैव कहा है कि अन्न का सम्मान करो और भूखे को भोजन कराओ। दान की महत्ता उसकी मात्रा से नहीं, उसके पीछे छिपे भाव से आँकी जाती है। यही कारण है कि किसी गरीब की आधी रोटी भी कई बार किसी अमीर की पूरी थाली से अधिक मूल्यवान हो जाती है।
आज का समय दिखावे का समय है। लोग छोटी-सी मदद भी चित्रों और संदेशों के माध्यम से सबको बताना चाहते हैं। लेकिन इस कहानी का युवक और वह वृद्धा हमें सिखाते हैं कि सबसे सुंदर उपकार वही होता है, जिसे केवल दो दिल जानते हों।
व्यापार में तराज़ू वजन तौलता है, लेकिन जीवन में ईश्वर भाव तौलते हैं। जहाँ करुणा होती है, वहाँ कृपा अपने आप बढ़ जाती है। जहाँ बाँटने की प्रवृत्ति होती है, वहाँ अभाव भी समृद्धि जैसा लगता है।
सच तो यह है कि छीनकर खाने वालों का पेट कभी नहीं भरता, लेकिन बाँटकर खिलाने वाला कभी भूखा नहीं रहता। प्रेम का पलड़ा हमेशा भारी होता है, और वही जीवन का सबसे सच्चा लाभ है।
कभी किसी बाज़ार में किसी वृद्धा की टोकरी के सामने ठहरिए। हो सकता है वहाँ आपको केवल संतरे न मिलें, बल्कि इंसानियत की वह मिठास भी मिल जाए, जो आज की भागती दुनिया में धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है। यही छोटी-छोटी संवेदनाएँ समाज को जीवित रखती हैं और यही रिश्तों को सचमुच मीठा बनाती हैं।

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