जीत के हारे हुए
22 अगस्त 2026
हमारे पास कुछ न शेष है, हम दे चुके सब कुछ उसे
हमसे उलछना छोड़ दो, जीत के हारे हुए.....!
हां हकीकत है यही जो जानता वह मौन है
स्वयं में वह स्वयं दृष्टा बन खड़ा वह कौन है
अनुवर्तन?दिशाएं खोज बैठी,रह गया वह शुण्य था
अबोध से स्वबोध? तक की यात्रा का वह पुण्य था
हमारे पास नही अवशेष कोई,दे चुके सब कुछ उसे
हमसे उलझना छोड़ दो, मीत के तारे हुए....!
आवागमन स्थिर रहा,एकाकी बस भाने लगा
नवागमन होगा कहां? आभासी! मन गाने लगा
व्योम अनहद चाह भी शून्य कर गई भावनाएं
अब शेष न विशेष न अवशेष न मनोकामनाएं
हमारे पास नही अवलेश कोई,दे चुके सब कुछ उसे
हमसे उलझना छोड़ दो,प्रीत के प्यारे हुए....!
ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'