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गांव बदल रहे हैं, लेकिन रोजगार की तस्वीर कब बदलेगी?सड़कें गांव तक पहुंच गईं, इंटरनेट घर-घर पहुंच गया, लेकिन क्या रोजगार भी पहुंचा?

गांव बदल रहे हैं, लेकिन रोजगार की तस्वीर कब बदलेगी?सड़कें गांव तक पहुंच गईं, इंटरनेट घर-घर पहुंच गया, लेकिन क्या रोजगार भी पहुंचा?


उत्तर प्रदेश के गांवों की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। पक्की सड़कें हैं, बिजली की पहुंच बेहतर हुई है, मोबाइल और इंटरनेट लगभग हर हाथ में है। गांव का युवा अब दुनिया से जुड़ा हुआ है। वह ऑनलाइन पढ़ाई कर सकता है, नौकरी की जानकारी हासिल कर सकता है और देश-दुनिया के बाजार को अपने मोबाइल से देख सकता है।

लेकिन इसी बदले हुए गांव के बीच एक पुराना सवाल आज भी खड़ा है—रोजगार कहां है?

गांव का युवा पढ़-लिखकर जब रोजगार की तलाश करता है तो उसकी नजर अक्सर शहर की तरफ जाती है। लखनऊ, दिल्ली, नोएडा, मुंबई या दूसरे बड़े शहरों में जाने का सिलसिला केवल बेहतर जिंदगी की चाह नहीं, बल्कि कई बार मजबूरी भी होता है। गांव में जमीन सीमित है, खेती की लागत बढ़ रही है और खेती से होने वाली आमदनी हर परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है।

नतीजा यह है कि गांव का युवा अपने परिवार, खेत और अपनी मिट्टी को छोड़कर शहर की ओर निकल जाता है।

यह पलायन केवल एक व्यक्ति का गांव छोड़ना नहीं है। इसके साथ गांव की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी बदलती है। बुजुर्ग और परिवार पीछे रह जाते हैं, जबकि काम करने वाली युवा आबादी बाहर चली जाती है।

सवाल यह नहीं है कि युवाओं को शहर क्यों जाना पड़ रहा है। असली सवाल यह है कि गांव में ऐसा क्या किया जाए कि शहर जाना मजबूरी न रहे।

इसके लिए रोजगार की परिभाषा बदलनी होगी।

गांव में रोजगार का मतलब केवल खेती या सरकारी नौकरी नहीं हो सकता। डेयरी, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे उद्योग, सिलाई-कढ़ाई, हस्तशिल्प, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, ग्रामीण पर्यटन और डिजिटल सेवाएं जैसे क्षेत्र स्थानीय स्तर पर आय के नए साधन बन सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के गांवों में छोटे-छोटे उत्पादों की कमी नहीं है। कहीं अचार और पापड़ बनते हैं, कहीं मिट्टी के सामान, कहीं हस्तशिल्प, कहीं कृषि आधारित उत्पाद। समस्या अक्सर उत्पादन से ज्यादा बाजार तक पहुंच की होती है।

आज जब ऑनलाइन बाजार गांव तक पहुंच चुका है, तो गांव के उत्पादों को भी बड़े बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।

इंटरनेट गांव के युवा को केवल रील देखने का माध्यम न बने, बल्कि कमाई का माध्यम भी बने—यह सोच जरूरी है।

लेकिन इसके लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। युवा को प्रशिक्षण चाहिए, छोटे कारोबार के लिए आसान वित्तीय सहायता चाहिए, बाजार चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण—सही मार्गदर्शन चाहिए।

महिलाओं को भी इस ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सक्रिय हिस्सा बनाना होगा। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं छोटे कारोबार खड़े कर रही हैं। अगर उन्हें बेहतर प्रशिक्षण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो घर की आय बढ़ने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो सकती है।

गांव के विकास का मतलब केवल यह नहीं कि वहां सड़क बन गई, बिजली आ गई और सरकारी भवन खड़ा हो गया।

गांव का असली विकास तब होगा, जब वहां रहने वाले युवा के पास रोजगार का विकल्प भी होगा।

अगर गांव का युवा अपने गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कमा सके, तो पलायन अपने आप कम होगा। इससे परिवार मजबूत होंगे, स्थानीय बाजार मजबूत होंगे और गांवों की अर्थव्यवस्था में पैसा घूमेगा।

हमें यह समझना होगा कि गांव को शहर में बदलना विकास नहीं है। विकास यह है कि गांव में रहते हुए भी व्यक्ति को शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

आज जरूरत गांव से शहर की ओर जाने वाली मजबूरी को खत्म करने की है।

क्योंकि जिस दिन गांव का युवा यह कह सकेगा—
“मेरे सपनों के लिए मुझे अपना गांव छोड़ना जरूरी नहीं है,”
उस दिन हम केवल गांव बदलने की बात नहीं करेंगे, बल्कि ग्रामीण भारत के बदलने की बात करेंगे।

गांव मजबूत होगा, तभी भारत की नींव और मजबूत होगी।

राम मगन सिंह
संपादक उत्तर प्रदेश
9936542581

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