100 रुपये के नोटरी स्टांप पर गरीब की अर्थी का सौदा! खून का सौदा या इंसानियत का जनाजा?
खून का सौदा या इंसानियत का जनाजा?
सौ रुपये के नोटरी स्टांप पर गरीब की मौत का समझौता!
मीना बाजार के झूले से गिरकर नकुल निषाद की मौत, दो मासूम बच्चों के सिर से उठा पिता का साया
दो लाख रुपये देकर समझौते का दावा, 24 घंटे बाद भी FIR दर्ज नहीं होने पर उठे सवाल; शासन-प्रशासन की जवाबदेही कटघरे में!
खरसिया। क्या किसी इंसान की जान की कीमत महज दो लाख रुपये हो सकती है? क्या नोटरी स्टांप पर लिखे समझौते से किसी की मौत की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? और क्या गरीब परिवार की मजबूरी कानून से भी बड़ी हो सकती है? खरसिया के टाउनहॉल मैदान में आयोजित मीना बाजार में हुए दर्दनाक हादसे के बाद ऐसे ही कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक ओर मृतक नकुल निषाद का परिवार गहरे दुख में डूबा है, वहीं दूसरी ओर कथित मुआवजा समझौते और पुलिस कार्रवाई की स्थिति को लेकर जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
झूले से गिरकर गई जान, पीछे रह गए अनाथ बच्चे
20 अक्टूबर 2026 को दशहरा मेले के दौरान पुसौर निवासी, वर्तमान में खरसिया के पठानपारा में रहने वाले नकुल निषाद की झूले से गिरने के बाद मौत हो गई। बताया गया कि वह अपने बच्चों को झूला झुलाने के लिए मीना बाजार पहुंचे थे। मेले की खुशियों के बीच हुआ यह हादसा एक परिवार की जिंदगी में कभी न भरने वाला खालीपन छोड़ गया। बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि हादसा किन परिस्थितियों में हुआ, झूले की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही किस प्रकार तय की जाएगी?
सौ रुपये के नोटरी स्टांप पर दो लाख का समझौता!
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, हादसे के अगले दिन 21 अक्टूबर को मीना बाजार संचालक दीपक मौर्य की ओर से मृतक की पत्नी को क्रियाकर्म के लिए दो लाख रुपये दिए जाने का उल्लेख एक नोटरी स्टांप पेपर पर किया गया। कथित दस्तावेज में पत्नी की ओर से राशि मिलने और भविष्य में शिकायत नहीं करने संबंधी सहमति दर्ज होने की बात कही गई है।
यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है। क्या किसी की मृत्यु के बाद आर्थिक सहायता देना और आपराधिक जिम्मेदारी तय करना एक ही बात है? क्या किसी समझौते में शिकायत नहीं करने की शर्त लिख देने मात्र से कानून के तहत जांच और कार्रवाई समाप्त हो सकती है?
कानून की नजर में किसी घटना की जिम्मेदारी केवल आपसी समझौते से अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। यदि मामले में लापरवाही से मृत्यु होने का अपराध बनता है, तो उसकी जांच और लागू कानून के अनुसार कार्रवाई का सवाल अलग है। संबंधित अपराध समझौता योग्य है या नहीं, यह तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय होगा।
एक ओर लाश, दूसरी ओर चलते रहे झूले!
इस घटना को लेकर एक और बेहद गंभीर सवाल उठाया जा रहा है। आरोप है कि हादसे के बाद भी मीना बाजार में झूले चलते रहे और अगले दिन भी वहां रौनक बनी रही। यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल संवेदनशीलता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी का भी गंभीर विषय है।
आखिर जिस स्थान पर एक व्यक्ति की जान चली गई, वहां सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा किए बिना मनोरंजन गतिविधियां जारी रखने की अनुमति कैसे दी गई? क्या झूलों की फिटनेस, तकनीकी जांच और सुरक्षा मानकों का सत्यापन किया गया था? क्या आयोजन के लिए आवश्यक प्रशासनिक अनुमति प्राप्त थी?
इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को तथ्यों के साथ देना चाहिए।
पुलिस कार्रवाई पर सवाल: 24 घंटे बाद भी FIR क्यों नहीं?
इस संबंध में चौकी प्रभारी त्रिनाथ त्रिपाठी से बातचीत की गई। उन्होंने बताया कि फिलहाल मामले में मर्ग जांच चल रही है और एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
चौकी प्रभारी के इस बयान के बाद सवाल उठता है कि घटना के बाद जांच किस स्तर पर पहुंची है और अब तक एफआईआर दर्ज नहीं करने का आधार क्या है? यदि जांच में लापरवाही या किसी अन्य अपराध के पर्याप्त तथ्य सामने आते हैं, तो आगे की कानूनी कार्रवाई कब तक की जाएगी?
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मर्ग जांच और एफआईआर की आवश्यकता का निर्धारण मामले के तथ्यों तथा लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार होता है। इसलिए पुलिस को जांच की स्थिति और कार्रवाई के आधार पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
शासन-प्रशासन की जवाबदेही भी सवालों के घेरे में
यदि मीना बाजार आवश्यक अनुमति के बिना संचालित हो रहा था, जैसा कि आरोप लगाया जा रहा है, तो संबंधित विभागों की भूमिका की जांच भी जरूरी है। आयोजन की अनुमति किसने दी? झूलों की फिटनेस किसने जांची? सुरक्षा मानकों का सत्यापन किस अधिकारी ने किया? और हादसे के बाद जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध क्या कदम उठाए गए?
इन सवालों का जवाब केवल मेला संचालक से नहीं, बल्कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से भी मांगा जाना चाहिए।
गरीब परिवार को आर्थिक सहायता मिलना एक अलग विषय है, लेकिन किसी व्यक्ति की मौत की कानूनी जिम्मेदारी तय करना अलग विषय है। दोनों को एक मानकर जांच को समाप्त नहीं किया जा सकता।
अब जनता को जवाब चाहिए
नकुल निषाद की मौत ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या हादसे के कारणों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या झूले की सुरक्षा और फिटनेस से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जाएगी? क्या कथित समझौते की कानूनी वैधता पर गौर किया जाएगा? क्या पुलिस और प्रशासन अपनी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करेंगे?
दो लाख रुपये के मुआवजे का उल्लेख किसी परिवार के दुख को कम नहीं कर सकता और न ही अपने आप किसी संभावित अपराध की जिम्मेदारी तय कर सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नकुल निषाद की मौत की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाएगी, या यह मामला नोटरी स्टांप पर दर्ज समझौते और मर्ग जांच तक ही सीमित रह जाएगा?
गरीब परिवार को न्याय दिलाना, सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा सुनिश्चित करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। खरसिया की जनता अब इन सवालों के स्पष्ट जवाब और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा कर रही है।
रिपोर्ट: किशोर कुमार चौहान साइंस वाणी न्यूज़ | खरसिया


