राजस्व न्यायालय के 16 प्रकरणों में गंभीर गड़बड़ी, तत्कालीन एसडीएम के कार्यकाल और कलेक्टर स्तर की समीक्षा पर सवाल!
राजस्व न्यायालय के 16 प्रकरणों में गंभीर गड़बड़ी, तत्कालीन एसडीएम के कार्यकाल और कलेक्टर स्तर की समीक्षा पर सवाल!
शासन को ऑनलाइन रिकॉर्ड से गुमराह करने का मामला? सारंगढ़ में 16 राजस्व प्रकरणों की स्थिति संदिग्ध, जांच आवश्यकता?
सारंगढ़-बिलाईगढ़ (छत्तीसगढ़):- सारंगढ़ के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय में 16 राजस्व प्रकरणों को अंतिम आदेश पारित होने से पहले ही ऑनलाइन पोर्टल पर ‘आदेश पूर्व में पारित’ दर्शाकर नस्तीबद्ध किए जाने का मामला सामने आया है। एसडीओ राजस्व न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर को पत्र लिखकर इन प्रकरणों को पुनः ऑनलाइन करने के लिए आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया है। पत्र के अनुसार, संबंधित प्रकरणों में अंतिम आदेश पारित नहीं हुआ था और वे ऑफलाइन न्यायालय में प्रक्रियाधीन थे।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि इन प्रकरणों में नियमित रूप से ऑफलाइन पेशियां ली जा रही थीं, तो तत्कालीन एसडीएम के कार्यकाल में ऑनलाइन रिकॉर्ड की इस विसंगति का संज्ञान लेकर उसे समय रहते दुरुस्त क्यों नहीं कराया गया? क्या इस त्रुटि की जानकारी संबंधित अधिकारियों को थी? यदि जानकारी थी, तो सुधारात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और यदि जानकारी नहीं थी, तो न्यायालयीन अभिलेखों तथा ऑनलाइन पोर्टल की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? क्या जानबूझकर गलत जानकारी दर्ज की गई या यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का मामला है? क्या उपलब्ध परिस्थितियों में कूटरचना अथवा गलत अभिलेख तैयार करने की आशंका की जांच आवश्यक नहीं है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल निष्पक्ष जांच और डिजिटल रिकॉर्ड के परीक्षण से ही मिल सकता है।मामला कलेक्टर स्तर की समीक्षा पर भी सवाल खड़े करता है। क्या जिला प्रशासन ने ऑनलाइन दर्ज प्रकरणों की वास्तविक न्यायालयीन स्थिति का सत्यापन किया था? यदि शासन को प्रगति रिपोर्ट ऑनलाइन आंकड़ों के आधार पर भेजी गई, तो क्या उसमें लंबित प्रकरणों को निराकृत दर्शाया गया? आखिर गलत जानकारी शासन तक पहुंची या नहीं, इसकी जांच कौन करेगा?
इसलिए यह जांचना आवश्यक है कि संबंधित 16 प्रकरणों की स्थिति के आधार पर उच्च अधिकारियों अथवा शासन को कौन-कौन सी रिपोर्ट भेजी गईं, उनका सत्यापन किसने किया और क्या उनमें वास्तविक न्यायालयीन स्थिति का सही उल्लेख था। फिलहाल उपलब्ध पत्र से किसी अधिकारी की व्यक्तिगत संलिप्तता या जानबूझकर तथ्य छिपाने की पुष्टि नहीं होती।