मोन माटी का पुकार
20 अक्टूबर 2026
साइंस वाणी तमनार
सेत कुमार प्रजा
मैं केवल एक मिट्टी का मूरत हूं
निश्चल बेजुबान और बेजान
पर तुम्हारे हाथों से स्पर्श से ही
पर जाती हूं ईश्वर का सम्मान
जब कलाकार की उंगलियां मुझे सहलाती है
मेरा रोम रोम पुलकित हो उठाता है
आंखें बनते ही जब दुनिया कोदेखती हूं
तो इंसान का ही चेहरा सबसे हसीन लगता है
सजाते हो मुझे रश्मि वस्त्र से
लगते हो माथे पर चंदन का टीका
तुम्हारी हर मूरत को चुपचाप सुनती हूं
चाहे मेरा अपना वजूद हो कितना ही फीका
मन में बस एक ही कसक रह जाती है
कि काश मेरे पास भी एक धड़कता दिल होता
जो तुम्हारे दुखों को देखकर रो सकता
जो तुम्हारी खुशियों में शामिल हो सकता
पर नियति का खेल भी कितना अजीब है
जिसने मुझे बनाया है वही विदा करने आता है
चंद दिनों के त्यौहार के बाद मुझे गहरे पानी में छोड़ना है
जब पानी की लहरें मुझे छुट्टी है
मेरा रंग मेरा रूप सब धीरे-धीरे गाल जाता है
ना कोई शिकायत ना कोई शिकवा है तुमसे
बस फिर से माटी बनने का दर्द खलता है
जाते-जाते भी बस यही दुआ है मेरी
जिस माटी से जन्मी इस में मिल जाऊंगी
अगले साल फिर से तुम्हारी आस्था बनकर किसी कुम्हार की चौखट पर मुस्कुराउंगी
जय विज्ञान जय भारत जय छत्तीसगढ़