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मोन माटी का पुकार

मोन माटी का पुकार

साइंस वाणी तमनार 
      सेत कुमार प्रजा
मैं केवल एक मिट्टी का मूरत हूं 
निश्चल बेजुबान और बेजान 
पर तुम्हारे हाथों से स्पर्श से ही 
पर जाती हूं ईश्वर का सम्मान 
जब कलाकार की उंगलियां मुझे सहलाती है 
मेरा रोम रोम पुलकित हो उठाता है 
आंखें बनते ही जब दुनिया कोदेखती हूं 
तो इंसान का ही चेहरा सबसे हसीन लगता है 
सजाते हो मुझे रश्मि वस्त्र से 
लगते हो माथे पर चंदन का टीका 
तुम्हारी हर मूरत को चुपचाप सुनती हूं 
चाहे मेरा अपना वजूद हो कितना ही फीका 
मन में बस एक ही कसक रह जाती है 
कि काश मेरे पास भी एक धड़कता दिल होता 
जो तुम्हारे दुखों को देखकर रो सकता
जो तुम्हारी खुशियों में शामिल हो सकता 
पर नियति का खेल भी कितना अजीब है 
जिसने मुझे बनाया है वही विदा करने आता है 
चंद दिनों के त्यौहार के बाद मुझे गहरे पानी में छोड़ना है
जब पानी की लहरें मुझे छुट्टी है
मेरा रंग मेरा रूप सब धीरे-धीरे गाल जाता है
ना कोई शिकायत ना कोई शिकवा है तुमसे 
बस फिर से माटी बनने का दर्द खलता है 
जाते-जाते भी बस यही दुआ है मेरी 
जिस माटी से जन्मी इस में मिल जाऊंगी 
अगले साल फिर से तुम्हारी आस्था बनकर किसी कुम्हार की चौखट पर मुस्कुराउंगी 
जय विज्ञान जय भारत जय छत्तीसगढ़

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