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  देश के विभिन्न शहरों से तमाम परेशानियों के बाद अपने गांव पहुंचे मज़दूरों को गांव के स्कूलों में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटरों में रखा गया है.

देश के विभिन्न शहरों से तमाम परेशानियों के बाद अपने गांव पहुंचे मज़दूरों को गांव के स्कूलों में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटरों में रखा गया है.


 की रिपोर्टअरविन्द खरवार
 देश के विभिन्न शहरों से तमाम परेशानियों के बाद अपने गांव पहुंचे मज़दूरों को गांव के स्कूलों में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटरों में रखा गया है. अधिकांश स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय आदि से जुड़ी अव्यवस्थाओं के चलते मज़दूरों का यह ‘एकांतवास’ नए संघर्ष में बदल गया है.
 _प्राथमिक विद्यालय (कचमन)_ अपने गांव लौटे प्रवासी मजदूर अब अपने घर के बजाय गांव के स्कूलों में बने क्वांरटीन सेंटर में हैं.

अधिकतर क्वारंटाइन सेंटरों में कामचलाऊ व्यवस्था है और यहां रूके प्रवासी मजदूरों को अपने घर से आए भोजन-पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों के टॉयलेट या तो खराब हैं या प्रयोग करने लायक नहीं है जिसके कारण प्रवासी मजदूरों को बाहर खुले में शौच करने जाना पड़ता है.

गांव में आकर घर-परिवार से दूर इन प्रवासी मजदूरों के लिए उनका मोबाइल फोन एक बड़ा सहारा है जिससे उनका समय कट रहा है.

कचमन प्राथमिक विद्यालय पर दस प्रवासी मजदूर क्वारंटाइन मे है।

जब प्रवासी मजदूर यहां आए तो जरूरी सुविधाएं उन्हें ही जुटानी पड़ी. स्कूल में बिजली कनेक्शन था लेकिन कोई बल्ब नहीं था. उन्होंने बल्ब लगवाया. चारपायी और मच्छरदानी भी घर से मंगवाई.

 खाने की व्यवस्था ग्राम पंचायत या प्रशासन की ओर से नहीं है. उनके घर से ही खाना आता है. स्कूल का हैंडपंप ठीक है. टॉयलेट भी ठीक है जिससे नित्य क्रिया में कोई दिक्कत नहीं हो रही है.

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