वक्त और इंसान*==============
20 मई 2021
*वक्त और इंसान*
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"वक्त" महान होता है व्यक्ति नहीं,
क्योंकि व्यक्ति "वक्त" का गुलाम होता है वक्त "व्यक्ति" का नहीं,
शायद इसी लिए "बदला लेना" हो या "बदलाव लाना" हो
व्यक्ति "वक्त" का इंतजार करता है
वक्त किसी व्यक्ति का नहीं।
ये तो वक्त ही है जनाब
जो किसी को "सरताज" बना देती है तो किसी को "मोहताज",
किसी का "राज़" बन जाता है तो किसी का "हमराज़" ।
वक्त कभी अपनी "चाल" नहीं बदलता
क्योंकि वक्त को है अपने आप पर "अटूट विश्वास",
परंतु व्यक्ति हर वक्त अपनी चाल बदलते रहता है
क्योंकि उसका है "टूटता हुआ विश्वास" ।
इससे एक बात तो जाहिर होता है कि
व्यक्ति को वक्त पर विश्वास नहीं
शायद इसीलिए सब कुछ स्वयं करना चाहता है
जबकि वक्त ही है जो किसी व्यक्ति को "विश्वासपात्र" बनाता है।
तो क्या वक्त और इंसान एक-दूसरे के पूरक हैं
क्योंकि इंसान बिना वक्त की
और वक्त बिना इंसान की पहचान नहीं ।
*सुनील भारद्वाज*
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