क्या उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा #कौशल विकास के कला बोर्ड के बहाने बहुजनों को उसके पैतृक व्यवसाय की तरफ तो नही ले जाया जा रहा? क्या यह पहल मनुस्मृति की और ले जाने वाला कदम तो नही?
क्या उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा #कौशल विकास के कला बोर्ड के बहाने बहुजनों को उसके पैतृक व्यवसाय की तरफ तो नही ले जाया जा रहा?
क्या यह पहल मनुस्मृति की और ले जाने वाला कदम तो नही?
सुशील कुमार कठेरिया
राष्ट्रीय अध्यक्ष
किसान सेना रिपब्लिक पार्टी
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1 माटी कला बोर्ड। (कुम्हार जाति के लिए)
2 केश कला बोर्ड। (नाइ जाति के लिए)
3 तेलमालिश कला बोर्ड।(नाऊन जाति के लिए)
4 चर्म कला बोर्ड। (चमार जाति के लिए) 5 गोश्त कला बोर्ड। (खटीक जाति के लिए)
6 खेतीबाड़ी कला बोर्ड। (माली,कुर्मी जाति के लिए)
7 भेड़ कला बोर्ड। (गडेरिया जाति के लिए)
8 दुग्धउद्योग कला बोर्ड। (अहीर जाति के लिए)
9 बराह कला बोर्ड। (पासी जाति के लिए)
10 प्रसव कला बोर्ड। (धानुक जाति के लिए)
11 वस्त्रधुलाई कला बोर्ड। (धोबी जाति के लिए)
इन बोर्डों को बनाने की मंशा साफ है कि भविष्य मे बहुजनों की संतानों को शिक्षा से दूर रख कर डॉक्टर, इंजीनियर, विज्ञानिक,शिक्षक, प्रोफेसर, पत्रकार, लेखक, अधिकारी(आईएएस,आईपीएस,बैंक मैनेजर आदि) न बनने दिया जाए। सिर्फ पैतृक व्यवसाय मे ही कौशल विकास करे और उस मनुस्मृति की विवस्था मे पहुँच जाए।
सभी जाट , गुर्जर, यादव, जाटव, वाल्मीकि ओबीसी एससी-एसटी अपने अपने पूर्वजों के काम की तरफ मोड़ा जा रहा है। बहुत पढ़ लिखकर अपने को हिन्दू बन गए थे, शुद्र हो वही औकात आरएसएस बीजेपी मनुवादी तुमको बता रहे है।
बहुत पैसा कमा लिया।