भारत की अधूरी आजादी क्यों?
भारत की अधूरी आजादी क्यों?
संकलन -सुशील कुमार कठेरिया
राष्ट्रीय अध्यक्ष किसान सेना रिपब्लिक पार्टी
आजादी के 73 साल बीत जाने के बाद भी देश की बहुजन जातियों को देश के सभी संसाधनों में समुचित हिस्सेदारी नहीं मिल सकी। मनुवादी सरकारें, मनुवादी मीडिया, मनुवादी जूडिसियरी,मिल जुलकर बहुजनों के संवैधानिक हिस्से छीनती और छिनवाती रही हैं।
आरक्षित कोटे के सांसद विधायक अपने अपने दलों के बंधुआ मजदूर और गुलाम बनकर सिर्फ गुलामी को इंज्वाय करने तक सीमित रहे।उन्होंने कभी अपने कराहते समाज की ओर नहीं देखा।थोड़े दिन पहले पार्लियामेंट में इस सरकार ने आंकड़े जारी कर कहा था कि एससी-एसटी कोटे में निर्धारित संख्या से ज्यादा लोग पहुंच गए हैं। सरकार को सवर्णै, ओबीसी, एससी-एसटी सभी के आंकड़े जारी करके देश के सामने रखना चाहिए ताकि पता चलता कि किस जाति समूह के पास ज्यादा और किसके पास कम नौकरियां हैं। सरकार का यह छलभरा बयान था जिसे किसी एससीएसटी ओबीसी लीडर या संगठन द्वारा विरोध नहीं किया गया।
बाबा साहब के जाने के काफी अरसे बाद मान्यवर कांसीराम ने बहुजन मूवमेंट को गति दिया था,बहुजनो में राजनैतिक भूख जगाई। पन्द्रह पचासी का नारा दिया "जितनी जिसकी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी" के नारों के साथ बहुजनो को देश का हुक्मरान बनने के लिए ललकारा था।
पर उनके जाने के थोड़े समय बाद ही बहुजन मूवमेंट बिखर सा गया। जहां एक ओर मान्यवर कांशीराम राम की विरासत समेटे बसपा में निष्क्रियता सी आ गई वहीं हजारों महत्त्वाकांक्षी लोगों के द्वारा राजनैतिक दलों का गठन कर बहुजन वोटों में जबरदस्त बिखराव किया जा रहा है।एक तरफ बसपा इन छोटे दलों से कभी हाथ मिलाने का प्रयास नहीं करती तो दूसरी तरफ यह छोटे-छोटे दल अपने अहंकार के चलते मिलजुलकर चुनाव लड़ने अथवा बहुजन वोटों के ध्रुवीकरण का प्रयास कभी नहीं करते।
आजादी के बाद कुछ दिन तक शोषित प्रताड़ित बहुजन जातियां, नौकरियां पाकर चंद ऊंचे ऊंचे ओहदे पाकर खुश थीं पर जैसे जैसे लोग पढ़ लिख गए बाबा साहब और बुद्ध दर्शन को जानने-समझने लगे वैसे वैसे उनमें चेतना जागी बहुजनो को ज्ञात हुआ कि वे इस देश के असली मूल निवासी हैं,पहले वे इस देश के शासक थे,और आज भी देश की 85%आबादी होने के कारण इस देश की सत्ता पर मूलनिवासी बहुजनो का ही कब्जा होना चाहिए।
पढ़ें लिखे मूलनिवासी बहुजन यह भी जान चुके हैं कि यहां की वर्णवादी व्यवस्था ने मूलनिवासी बहुजन जातियों की संस्कृति को नष्ट करके देश की सत्ता, सम्पदा,शिक्षा,शस्त्र संस्कृति पर कब्जा करके उन्हें गुलाम बनाया।यह व्यवस्था हजारों साल तक चलती रहे इसके लिए समाज को चतुरवर्ण व्यवस्था और सीढ़ीनुमा हजारों जातियों में बांटा गया।फिर कठोर धार्मिक नियमों में जकड़े रखने के लिए वेद,पुराण, स्मृतियां, रामायण, महाभारत जैसे अवैज्ञानिक ग्रंथों की रचना किया।भाग्य-भगवान,पुनर्जन्म तंत्र-मंत्र कथा भागवत देबी देवताओं ढोंग पाखंड के जाल में बहुजन समाज को बुरी तरह जकड़ कर रखा गया। धार्मिक नियमों के उलंघन करने पर शूद्र जातियों को क्रूरतम दंड दिए गए जिससे वे मनुष्य होने का एहसास ही भूल गए।
ईशा पूर्व 563 में जन्मे तथागत बुद्ध ने इस देश में एक बृहद सामाजिक क्रांति किया था और देश में समतामूलक समाज बनाने में कामयाब हुए थे।पर बौद्ध राजा बृहद्ररथ के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने ईसा पू० सन् 185 मे राजा बृहद्ररथ की हत्या कर स्वंय राजा बन बैठा उसने ब्रह्मण धर्म की स्थापना के बाद बौद्ध काल के सभी विश्वविद्यालयों,बौद्ध विहारों,बौद्धस्तूपों एवं अन्य सभी बौद्ध अवशेषों को ध्वस्त करा दिया।लाखों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करा दिया।ब्राह्मण धर्म के चलते देश के लाखों बौद्ध विहारों को हिंदू मंदिरों में कनवर्ट किया गया। अयोध्या,काशी विश्वनाथ, मथुरा, तिरुपति बालाजी पद्मनाभ ऐसे अनेक हिंदू मंदिर हैं जहां बौद्ध अवशेष उपलब्ध हैं।
बहुजन देश के सभी संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी न क्लेम कर सकें, हिंदू मंदिरों में कन्वर्ट किए गए बौद्ध स्थलों पर कब्जा न कर सकें,उच्च न्यायपालिका,सेना,कृषि योग्य भूमि, पर अपना हिस्सा न क्लेम कर सकें, बहुजन जातियों को गोलबंद कर सत्ता न हथिया सकें इसके लिए सवर्ण और उनकी सरकारें संविधान को जलवा रहीं,आरक्षण खत्म करा रही, बाबा साहब की मूर्तियों को तोड़ा जा रहा उनकी विरासत पर हमलें किए जा रहे,दलितों पर हमले, उनकी माव्लिंचिग करना,दूल्हों को घोड़ी पर न चढ़ने देना,बहू बेटियों के साथ बलात्कार,पिछाड़ी गई जातियों के आरक्षण को खत्म कर उनके आगे बढ़ने के मार्ग को अवरूद्ध करना अल्पसंख्यकों से ज़बरदस्ती जयश्रीराम के नारे लगवाना,उनको मार डालना,उनके बच्चों को गायब करना,डराना प्रताड़ित करना आदि ऐसे कार्य हैं जो मूलनिवासी बहुजन जातियों के मूवमेंट को रोकने के लिए किए जा रहे। उनके सत्ता पर लम्बे समय तक काबिज रहने, आर्यन सभ्यता को बहुजन जातियों पर थोपे जाने के कारण देश की वंचित बहुजन जातियां आज भी गुलामी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।
बाबा साहब ने संविधान बनाकर बहुजन जातियों की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया था परन्तु यहां की सवर्ण शासक जातियों ने संविधान को ठीक से लागू नहीं किया इसीलिए देश की बहुजन जातियों की आजादी अधूरी रह गई।
बहुजनवादी संगठनों को अब छुट-पुट समस्याओं छोटे मोटे आंदोलनों से ऊपर उठकर "बहुजन आजादी आंदोलन" की शुरूआत करनी चाहिए।अपने आंदोलन के लिए इनमें से कुछ मुद्दे प्राथमिकता के तौर पर लिए जा सकतें हैं।खेती लायक जमीन पर हिस्सेदारी,कनवर्ट किए गए बौद्ध स्थलों पर कब्जा,उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व, एक-समान शिक्षा,आय के सभी श्रोतों में हिस्सेदारी,देश की सभी नौकरियां में संख्या बल के अनुसार प्रतिनिधित्व।जब इन मुद्दों पर आंदोलन शुरू होगा तब मूलनिवासी बहुजन जातियां अपने आप गोलबंद होंगी और तब देश के कारोबार को हथियाने में देर नहीं लगेगी।
--आर.जी.कुरील
11.07.2020
--मान्यवर एच एल दुसाध जी के वाल से