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रीवा में कलाकार की गिरफ्तारी पर छिड़ी बहस, सोशल मीडिया में उभरा समाज और पत्रकारिता पर बड़ा सवाल

रीवा में कलाकार की गिरफ्तारी पर छिड़ी बहस, सोशल मीडिया में उभरा समाज और पत्रकारिता पर बड़ा सवाल


श्री निवास मिश्रा मैहर 
 इन दिनों सोशल मीडिया पर रीवा के चर्चित कलाकार मनीष पटेल का मामला तेजी से वायरल हो रहा है। हर प्लेटफॉर्म पर गिरफ्तारी को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि जानकारी के अनुसार मनीष पटेल ने पुलिस के सामने स्वयं सरेंडर किया था, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने केवल एक व्यक्ति या एक बयान तक सीमित न रहकर समाज, कलाकारों और पत्रकारिता की स्थिति पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

घटना के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग समाजों और संगठनों की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। किसी ने इसे समाज के सम्मान से जोड़ा, तो किसी ने कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाया। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने यह भी कहा कि गलती किसी से भी हो सकती है और यदि व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर माफी मांग ले, तो समाज को भी क्षमा का रास्ता अपनाना चाहिए।

*“कलाकार की इज्जत क्या है?” — कलाकारों की पीड़ा आई सामने*

पूरा मामला सामने आने के बाद कई कलाकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा जाहिर की। उनका कहना है कि समाज में कलाकारों को आज भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार कलाकार यदि समाज की सच्चाई दिखाने का प्रयास करते हैं तो उन्हें ट्रोलिंग, धमकी और कानूनी कार्रवाई तक का सामना करना पड़ता है।

कलाकारों का कहना है कि जब वे समाज को आईना दिखाते हैं, तब उनकी सकारात्मक बातों की चर्चा नहीं होती, लेकिन किसी विवादित टिप्पणी या गलती के बाद उन्हें तुरंत कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। कई लोगों ने यह भी मांग उठाई कि कलाकारों का भी एक मजबूत संगठन होना चाहिए, जो ऐसे मामलों में निष्पक्ष तरीके से कलाकारों की बात समाज और प्रशासन तक पहुंचा सके।

*जातीय तनाव को लेकर भी उठे सवाल*

इस मामले के बाद सोशल मीडिया पर जातीय एकजुटता और विरोध को लेकर भी तीखी बहस छिड़ गई। लोगों का कहना है कि आज समाज में छोटी-छोटी घटनाएं भी जातिगत रंग लेने लगी हैं। किसी एक व्यक्ति की गलती पूरे समाज से जोड़ दी जाती है, जिससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है।

कई सामाजिक चिंतकों ने कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में समाज लगातार छोटे-छोटे समूहों में बंटता जाएगा और आपसी टकराव बढ़ेंगे। लोगों ने अपील की कि किसी भी घटना को व्यक्ति विशेष तक सीमित रखा जाए, पूरे समाज को निशाना न बनाया जाए।

*पत्रकारिता की भूमिका पर भी उठे गंभीर प्रश्न*

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका को लेकर भी सोशल मीडिया पर जमकर बहस हुई। कई लोगों ने आरोप लगाया कि कुछ मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया चैनलों ने निष्पक्षता के बजाय सनसनी फैलाने का काम किया।

पत्रकारिता से जुड़े लोगों का कहना है कि पत्रकारिता समाज का दर्पण मानी जाती है, जिसका उद्देश्य सही और निष्पक्ष जानकारी जनता तक पहुंचाना होता है। लेकिन वर्तमान समय में सोशल मीडिया की प्रतिस्पर्धा और वायरल संस्कृति के कारण तथ्यों से अधिक उत्तेजना पर जोर दिया जा रहा है।

कुछ वरिष्ठ लोगों ने चिंता जताई कि आज बिना पत्रकारिता की समझ और प्रशिक्षण के भी कई लोग माइक और कैमरा लेकर पत्रकारिता करने लगे हैं। भाषा, मर्यादा, तथ्य और नैतिकता की कमी के कारण पत्रकारिता का स्तर प्रभावित हो रहा है, जिससे जनता का भरोसा भी लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

*समाज को सकारात्मक सोच की जरूरत*

मामले को लेकर सोशल मीडिया पर दो पक्ष स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। एक पक्ष कठोर कार्रवाई की मांग कर रहा था, जबकि दूसरा पक्ष गलती स्वीकारने के बाद माफी और सुधार का अवसर देने की बात कह रहा था।

सामाजिक जानकारों का मानना है कि किसी भी समाज की मजबूती उसकी सहनशीलता, संवाद और सकारात्मक सोच से होती है। केवल बुराइयों पर ध्यान देने के बजाय समाज में हो रहे अच्छे कार्यों को भी सामने लाना जरूरी है। कलाकार, पत्रकार और समाज — तीनों लोकतंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं और इन सभी की जिम्मेदारी है कि सामाजिक सौहार्द और मर्यादा बनाए रखें।

*रीवा का यह मामला अब केवल एक गिरफ्तारी या सरेंडर तक सीमित नहीं रह गया है। इसने समाज में बढ़ती कटुता, सोशल मीडिया ट्रायल, कलाकारों की असुरक्षा और पत्रकारिता की विश्वसनीयता जैसे कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह जरूरी होगा कि समाज भावनाओं के बजाय संतुलन और समझदारी के साथ ऐसे मामलों को देखे, ताकि विवाद की जगह संवाद और सुधार का रास्ता मजबूत हो सके।

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