-->
रोजगार बचाने की जंग तेज:सिंघीतराई  वेदांता गेट पर 400 श्रमिकों का धरना, जनता पूछ रही"संकट की घड़ी में आखिर हमारे जनप्रतिनिधि कहां हैं?

रोजगार बचाने की जंग तेज:सिंघीतराई वेदांता गेट पर 400 श्रमिकों का धरना, जनता पूछ रही"संकट की घड़ी में आखिर हमारे जनप्रतिनिधि कहां हैं?





शक्ति। 22 जून जिले के सिंघीतराई स्थित वेदांता कंपनी में लगभग 400 कर्मचारियों की नौकरी पर मंडरा रहे संकट ने अब बड़ा जनआंदोलन का रूप लेना शुरू कर दिया है। रोजगार बचाने की मांग को लेकर कर्मचारी लगातार सड़क पर उतर रहे हैं। प्रभावित श्रमिकों का कहना है कि वे कई दिनों से लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, कई बार ज्ञापन सौंप चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है। उनकी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।



कर्मचारियों का कहना है कि यदि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया तो उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। श्रमिकों का कहना है कि वे अपने परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और घर की रोजमर्रा की जरूरतें इसी नौकरी के सहारे पूरी करते हैं। ऐसे में रोजगार छिन जाने से सैकड़ों परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।





"जमीन हमारी, फिर हमें ही क्यों किया जा रहा बेरोजगार?"


प्रदर्शन कर रहे स्थानीय श्रमिकों का आरोप है कि जिस जमीन पर आज उद्योग स्थापित है, वह क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों द्वारा दी गई थी। उस समय ग्रामीणों को उम्मीद थी कि उद्योग स्थापित होने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र का विकास होगा। लेकिन अब स्थानीय कर्मचारियों को ही नौकरी से हटाने की आशंका ने लोगों में नाराजगी पैदा कर दी है।



श्रमिकों का कहना है कि बाहर के राज्यों से आए लोगों को रोजगार दिया जा रहा है, जबकि स्थानीय लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। उनका कहना है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार देना कंपनी और प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए


जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल


इस पूरे मामले को लेकर कर्मचारियों ने शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों का कहना है कि चुनाव के समय रोजगार, विकास और युवाओं के हितों की रक्षा के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में प्रभावित परिवार खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है ताकि वे जनता की आवाज बन सकें और उनकी समस्याओं को शासन तक पहुंचा सकें। ऐसे में सैकड़ों परिवारों के रोजगार से जुड़े इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों से सक्रिय हस्तक्षेप की अपेक्षा की जा रही है।

श्रमिकों में बढ़ रहा आक्रोश

लगातार धरना-प्रदर्शन के बावजूद समाधान नहीं निकलने से प्रभावित कर्मचारियों और उनके परिवारों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। श्रमिकों का कहना है कि यदि समय रहते उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जा सकता है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और जनता अपने प्रतिनिधियों से उम्मीद करती है कि वे संकट के समय उनके साथ खड़े होंगे। श्रमिकों ने मांग की है कि शासन-प्रशासन, जनप्रतिनिधि और कंपनी प्रबंधन मिलकर तत्काल समाधान निकालें, ताकि सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी सुरक्षित रह सके।

सबसे बड़ा सवाल

आखिर 400 परिवारों की आजीविका से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर ठोस पहल कब होगी? क्या स्थानीय श्रमिकों की आवाज सुनी जाएगी, या फिर उनकी चिंता यूं ही बनी रहेगी? अब पूरे क्षेत्र की निगाहें शासन, प्रशासन, कंपनी प्रबंधन और जनप्रतिनिधियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article