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दो पृष्ठों के बीच"

दो पृष्ठों के बीच"



नगर के पुराने पुस्तकालय में एक शोधार्थी अक्सर आया करता था। वह पुस्तकों के साथ ही उनके भीतर छूट गई चीज़ों में रुचि रखता था।

कभी किसी पृष्ठ के बीच सूखा गुलाब मिल जाता, कभी पन्ने का मुड़ा हुआ कोना, कभी किसी अज्ञात पाठक द्वारा रेखांकित पंक्तियाँ।

एक दिन उसे एक पुरानी पुस्तक में पीपल का सूखा पत्ता मिला।

पत्ता इतना पुराना था कि उसकी नसें स्पष्ट दिखाई देती थीं, मानो समय ने उसके शरीर से रंग लेकर केवल स्मृति छोड़ दी हो।

उसने पुस्तकालयाध्यक्ष से पूछा—"यह पत्ता कब से यहाँ होगा?"

वृद्ध मुस्कुराया।

"शायद उतने समय से, जितने समय से कोई उसे भूल नहीं पाया।"

"पर जिसने रखा होगा, वह तो अब यहाँ नहीं है।"

"हर रखी हुई चीज़ वापस लेने के लिए नहीं रखी जाती," वृद्ध ने कहा, "कुछ चीज़ें केवल यह प्रमाण देने के लिए छोड़ी जाती हैं कि कभी कोई यहाँ था।"

शोधार्थी देर तक उस पत्ते को देखता रहा।

उसे पहली बार लगा कि पुस्तकें केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं। वे अनुपस्थित लोगों की उपस्थिति भी सँभालती हैं।

उसने पत्ते को वहीं रहने दिया।

कुछ स्मृतियों का स्थान लौटकर शाखाओं पर नहीं, दो पृष्ठों के बीच ही होता है।

ऋचा चंद्राकर महासमुंद

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