“आजादी के 79 बछर : का हमन मानसिक गुलामी ले आजाद हो पायेन?”
21 अगस्त 2026
भारत ल अंग्रेजी हुकूमत ले आजाद हुए 79 बछर हो गे। 15 अगस्त 1947 के दिन हमर देश ल राजनीतिक आजादी मिलिस। आजादी के बाद देश विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, कृषि, उद्योग अउ संचार के क्षेत्र म बहुत आगू बढ़िस। फेर आज 79 बछर बाद घलो एक सवाल हमर सामने खड़े हे—का हमन सिरिफ अंग्रेज मन के गुलामी ले आजाद होय हवन, या हमर सोच-विचार घलो आजाद होय हे?
आजादी के मतलब सिरिफ विदेशी शासन ले मुक्ति नइ होवय। असल आजादी त वो हवे, जेमा मनखे अपन बुद्धि अउ विवेक ले सोच सकय, गलत ल गलत कह सकय, सवाल पूछ सकय, अपन बात ल बिना डर के रख सकय अउ दूसर मन के विचार के सम्मान कर सकय।
दुख के बात ये हे कि आज घलो हमर समाज के एक बड़े हिस्सा म धरमान्धता, जात-पात, अंधविश्वास, संकीर्ण सोच अउ राजनीतिक स्वार्थ के जाल गहरावत जात हे। हमन वैज्ञानिक जुग म जीअत हवन, फेर कतको बेर हमर सोच ह रूढ़ि अउ पहिली के सोच (या मन के खोट) के बेड़ी म बंधाय दिखथे। एही मानसिक गुलामी हमर लोकतंत्र बर एक बड़े चुनौती बनत जात हे।
*धरम आस्था आय, राजनीति के हथियार नइ*
भारत के सबले बड़े ताकत हमर विविधता आय। अलग-अलग धरम, भाषा, जाति, संस्कृति अउ परंपरा के मनखे कई बछर ले एक-दूसर के संग रहत आए हवंय। धरम मनखे के आस्था अउ आत्मिक शांति के विषय हो सकथे, फेर जब धरम ल सत्ता अउ राजनीति हासिल करे के हथियार बना दे जाथे, त समाज म भाईचारा के जगह नफरत अउ सदभाव के जगह टकराव बाढ़े लगथे।
आज चुनावी राजनीति म कई बार रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, महंगाई अउ गरीबी जइसन असली सवाल पाछू छूट जाथे अउ धार्मिक भावना, जातीय पहचान अउ भावनात्मक मुद्दा आगू आ जाथे।
*हमन ये बात ल समझना होही कि—*
भूखे मनखे बर रोटी जरूरी हे,
बेरोजगार जवान बर काम जरूरी हे,
किसान बर फसल के सही दाम जरूरी हे,
गरीब बर इलाज अउ शिक्षा जरूरी हे।
धरम मनखे ल जोड़े के काम करथे, मनखे-मनखे के बीच दीवार खड़ा करे के नइ।
*मानसिक विकास बिना असल विकास अधूरा हे*
कोनो देश के विकास ल सिरिफ बड़े-बड़े सड़क, पुल, भवन अउ चमचमात शहर ले नइ नापे जा सकय। देश के असली विकास वो हवे, जेमा ओकर नागरिक शिक्षित, जागरूक, संवेदनशील अउ विवेकशील होवंय।
विज्ञान हमन ल चांद तक पहुंचा दिस, फेर समाज के भीतर आज घलो अंधविश्वास अउ रूढ़िवाद के जड़ मजबूत दिखथे। इंटरनेट के जमाना म अफवाह मिनट भर म हजारों-लाखों मनखे तक हबर जाथे। बिना सोचे-समझे बात ल सही मान लेना अउ दूसर के खिलाफ नफरत फइलाना हमर मानसिक कमजोरी के चिन्हारी आय।
जेन समाज सवाल पूछना छोड़ देथे, वो समाज धीरे-धीरे अपन सोच के आजादी गंवा देथे।
हमर शिक्षा बेवस्था अइसन होय ला चाही, जेन सिरिफ नौकरी करे के लायक नइ बनाय, बल्कि सही-गलत के बीच अंतर समझे, सवाल पूछे अउ संविधान के मूल्य ल समझे के ताकत घलो देय।
*भ्रष्टाचार, बेरोजगारी अउ महंगाई के मार*
आज आम आदमी के आघू म रोज के जिनगी ले जुड़े कई गंभीर सवाल हवय। बेरोजगारी जवान मन के चिंता बने हे। महंगाई गरीब अउ मध्यम वर्ग के घर के बजट बिगाड़त हे। घूसखोरी बेवस्था ऊपर ले जनता के भरोसा कमावत हे।
छत्तीसगढ़ घलो ए सब समस्या ले अछूता नइ हे। हमर प्रदेश प्राकृतिक संपदा ले भरपूर हे। जंगल, खनिज, पानी, जमीन अउ किसानी के हमर पास बहुत बड़े भंडार हवंय। फेर सवाल ये हे कि ए सब संपदा के फायदा आखिर कोन पावत हे?
गांव के किसान, खेतिहर मजदूर, छोटे बयपारी अउ बेरोजगार जवान जब अपन बुनियादी जरूरत पूरा करे बर जूझत रहिथे, त विकास के आंकड़ा ले जादा जरूरी ओकर जिनगी के सच्चाई हो जाथे।
छत्तीसगढ़ के विकास के मतलब सिरिफ बड़े-बड़े उद्योग लगाना नइ हो सकय। विकास वो होही, जेमा गांव के लइका मन ल बढ़िया शिक्षा मिलय, जवान मन ल रोजगार मिलय, किसान ल फसल के उचित दाम मिलय, गरीब ल इलाज मिलय अउ जंगल-जमीन-पानी के रक्षा होय।
*छत्तीसगढ़ : विकास के नाव म का खोवत हवन?*
छत्तीसगढ़ के पहचान सिरिफ ओकर खनिज संपदा नइ आय। हमर पहचान हमर जंगल, नदी, पहाड़, खेत, गांव, लोककला, लोकभाषा अउ मेहनत करइया मनखे मन ले हे।
विकास जरूरी हे, फेर अइसन विकास काबर, जेमा जंगल उजड़ जावय, गांव उजड़ जावय अउ अपन जमीन ले जुड़े मनखे अपन घर-दुआर छोड़के पलायन करे बर मजबूर हो जावंय?
हमन ल तय करना होही कि आने वाला पीढ़ी ल कइसन छत्तीसगढ़ देना हे। अइसन छत्तीसगढ़, जिहां जंगल बचे रहय, नदी साफ रहय, किसान खुशहाल रहय, गांव म रोजगार मिलय, जवान मन के हाथ म काम रहय अउ गरीब मनखे सम्मान के संग जिनगी जी सकय।
*राजनीति के गिरत स्तर*
लोकतंत्र म राजनीति समाज बदले के सबले ताकतवर जरिया हो सकथे। फेर जब राजनीति जनसेवा के बजाय सत्ता हासिल करे के जरिया बन जाथे, त लोकतंत्र के मूल भावना कमजोर होय लगथे।
आज राजनीति म विचारधारा के बहस ले जादा व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, नफरत, झूठा प्रचार अउ एक-दूसर ल नीचा दिखाय के होड़ दिखथे।
सत्ता पक्ष के जिम्मेदारी सिरिफ सत्ता के बचाव करना नइ, बल्कि जनता के सवाल के जवाब देना घलो आय। विपक्ष के काम सिरिफ विरोध करना नइ, बल्कि बेहतर विकल्प देना घलो आय।
अउ जनता के जिम्मेदारी सिरिफ चुनाव के दिन वोट देना नइ आय। जनता ल हर दिन अपन जनप्रतिनिधि ले सवाल पूछे के अधिकार अउ जिम्मेदारी दुनों हे।
लोकतंत्र म नेता जनता के मालिक नइ होवंय, वो जनता के प्रतिनिधि होथे।
फेर एक बार आजादी के मतलब समझे के जरूरत हे
हमन ल धरम ले लड़ई नइ करना हे, धरम के नाव म होवत नफरत ले लड़ना हे।
हमन ल परंपरा ल मिटाना नइ हे, बल्कि परंपरा के नाव म जेन अंधविश्वास अउ जड़ता समाज ल पीछे धकेलथे, ओकर विरोध करना हे।
हमन ल राजनीति ले दूर भागना नइ हे, बल्कि राजनीति ल जनहित, ईमानदारी अउ संवैधानिक मूल्य मन के रद्दा म वापस लाना हे।
आजादी के 79 बछर बाद आज हमन अपन आप ले कुछ सवाल पूछन चाही—
*हमन आखिर कती जावत हवन?*
का हमर लोकतंत्र मजबूत होवत हे?
का हमर शिक्षा हमर सोच ल आजाद कर पावत हे?
का हमर जवान मन ल पर्याप्त रोजगार मिलत हे?
का किसान अउ मजदूर सम्मान के संग जिनगी जी पावत हवंय?
का राजनीति जनता के असली सवाल ऊपर बात करत हे?
का धरम हमर समाज ल जोड़त हे, या राजनीति के स्वार्थ हमर समाज ल बांटत हे?
ए सब सवाल मन ले मुंह चुराना ही मानसिक गुलामी आय।
अउ ए सब सवाल मन ल बिना डर के पूछना ही सच्ची आजादी के शुरुआत आय।
आज जरूरत कोनो एक नेता, एक पार्टी या एक विचार के अंधभक्ति के नइ हे। जरूरत हे—संविधान, लोकतंत्र, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक न्याय अउ मानवीयता के रक्षा करे के।
अंग्रेज मन ले राजनीतिक आजादी हमन ल 1947 म मिल गे रहिस।
फेर मानसिक आजादी?
ओ आजादी हमन ल खुद हासिल करना होही।
जेन दिन हमर देश के नागरिक बिना डर, बिना अंधभक्ति अउ बिना पूर्वाग्रह के ये सवाल पूछ सकही—
“हमर देश आखिर कती जावत हे?”
ओ दिन समझबो कि आजादी सिरिफ इतिहास के किताब म नइ, बल्कि हमर सोच अउ चेतना म घलो उतर गे हे।
आजादी के असली लड़ई अब बाहर के गुलामी ले नइ, हमर भीतर के गुलामी ले हे।
जय संविधान
जय लोकतंत्र
जय हिंद
जय छत्तीसगढ़
*डॉ. गणेश कौशिक*
त्रिमूर्ति चौक, सुन्दर नगर, रायपुर
15.08.2026