मदनपुर के नील सरोवर की बदहाली ने खोली व्यवस्था की पोल, 82.69 लाख खर्च बेअसर?
सीएसआर की भारी-भरकम राशि खर्च होने के बाद भी नहीं बदली तस्वीर, अब रखरखाव और विकास कार्यों की उपयोगिता पर उठ रहे सवाल
साइंस वाणी न्यूज़ | खरसिया
खरसिया।
तहसील कार्यालय के मुख्य द्वार के सामने स्थित मदनपुर पंचायत का नील सरोवर तालाब इन दिनों अपनी बदहाल स्थिति को लेकर सुर्खियों में है। कभी विकास और सौंदर्यीकरण की उम्मीदों के साथ जिस तालाब पर सीएसआर मद से 82.69 लाख रुपये खर्च किए गए थे, वही तालाब आज गंदगी, कचरे और अव्यवस्थित जल निकासी की समस्या से जूझता नजर आ रहा है। लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद तालाब की मौजूदा स्थिति देखकर अब विकास कार्यों की उपयोगिता, रखरखाव और जिम्मेदारी को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
लाखों का खर्च... लेकिन तालाब की हालत जस की तस!
जानकारी के अनुसार नील सरोवर तालाब के विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए सीएसआर मद से बड़ी राशि खर्च की गई थी। इसके तहत तालाब की साफ-सफाई, गहरीकरण, पचरी निर्माण, सीमेंट-कांक्रीट सड़क सहित विभिन्न कार्य कराए गए। उस समय उम्मीद की गई थी कि विकास कार्यों के बाद तालाब क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी और लोगों को बेहतर सुविधा मिलेगी।
लेकिन वर्तमान स्थिति इन उम्मीदों पर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही है। तालाब में गंदा पानी, कचरा और अव्यवस्था नजर आने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 82.69 लाख रुपये खर्च होने के बाद भी तालाब की नियमित सफाई और संरक्षण की व्यवस्था आखिर क्यों नहीं हो सकी
जल निकासी की व्यवस्था नहीं बनी, तो विकास कार्यों का क्या फायदा?
स्थानीय लोगों के अनुसार तालाब में पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण लंबे समय तक पानी जमा रहता है। पानी के ठहराव और नियमित सफाई के अभाव में तालाब की स्थिति लगातार प्रभावित हो रही है।
लोगों का कहना है कि किसी सार्वजनिक तालाब के विकास पर लाखों रुपये खर्च करना निश्चित रूप से अच्छी पहल है, लेकिन यदि जल निकासी, स्वच्छता और रखरखाव की स्थायी व्यवस्था नहीं हो तो करोड़ों की योजनाएं भी समय के साथ अपनी उपयोगिता खो सकती हैं।
कई पंचायतों के लोगों के उपयोग में आता है तालाब
नील सरोवर तालाब का उपयोग केवल मदनपुर पंचायत के लोग ही नहीं करते, बल्कि आसपास की कई पंचायतों के लोग भी अपनी जरूरत के अनुसार यहां के पानी का उपयोग करते हैं। ऐसे में तालाब की लगातार बिगड़ती स्थिति स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि तालाब को केवल एक निर्माण परियोजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह क्षेत्र का महत्वपूर्ण सार्वजनिक जलस्रोत है, इसलिए इसकी स्वच्छता, संरक्षण और नियमित रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
‘विकास’ के बाद बदहाली क्यों? उठने लगे कई सवाल
लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी तालाब यदि गंदगी और कचरे की समस्या से जूझ रहा है, तो स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या विकास कार्यों के साथ स्थायी जल निकासी की योजना बनाई गई थी?
क्या तालाब की नियमित सफाई और रखरखाव की जिम्मेदारी तय की गई है?
82.69 लाख रुपये से कराए गए कार्यों का वर्तमान में क्या लाभ मिल रहा है?
क्या संबंधित अधिकारियों ने निर्माण के बाद तालाब की स्थिति का नियमित निरीक्षण किया?
इन सवालों का जवाब अब क्षेत्रवासी जिम्मेदार अधिकारियों से चाहते हैं।
सिर्फ निर्माण नहीं, रखरखाव भी जरूरी
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सार्वजनिक संपत्तियों पर सरकारी या सीएसआर राशि खर्च करने के बाद उनकी देखरेख की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। तालाब में कचरा जमा होता रहे और पानी लंबे समय तक ठहरा रहे, तो धीरे-धीरे पूरा विकास कार्य अपनी चमक खो देता है।
लोगों की मांग है कि संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर नील सरोवर तालाब का निरीक्षण करें, गंदगी और कचरे को तत्काल हटवाएं तथा पानी की निकासी के लिए स्थायी समाधान तैयार करें।
82.69 लाख के खर्च की हो समीक्षा
क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि नील सरोवर तालाब के विकास में खर्च हुई 82.69 लाख रुपये की राशि से कराए गए कार्यों की समीक्षा की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि वर्तमान में तालाब के रखरखाव की जिम्मेदारी किस विभाग अथवा संस्था की है और अब तक इसकी नियमित सफाई के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
अब देखना होगा—कब जागेंगे जिम्मेदार?
नील सरोवर तालाब पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि आज भी गंदगी, कचरा और जल निकासी की समस्या बनी हुई है, तो यह निश्चित रूप से जिम्मेदार व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है। अब क्षेत्रवासियों की नजर प्रशासन और ग्राम पंचायत पर है कि क्या सिर्फ कागजों में विकास दिखाई देगा या जमीन पर भी नील सरोवर की तस्वीर बदलेगी?
82.69 लाख रुपये के खर्च के बाद बदहाल नील सरोवर अब जवाब मांग रहा है—आखिर लाखों का विकास गया कहां?



