नवरात्रि की पवित्रता व लोक संस्कृति के संरक्षण हेतु छत्तीसगढिया क्रान्ति सेना ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, जिलाध्यक्ष अलेक्जेंडर टोप्पो ने की शालीन परिधान व पारंपरिक लोक नृत्यों को अनिवार्य करने की मांग
15 अक्टूबर 2026
नवरात्रि की पवित्रता व लोक संस्कृति के संरक्षण हेतु छत्तीसगढिया क्रान्ति सेना ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, जिलाध्यक्ष अलेक्जेंडर टोप्पो ने की शालीन परिधान व पारंपरिक लोक नृत्यों को अनिवार्य करने की मांग
छत्तीसगढ़ / कोरबा शारदीय नवरात्रि महापर्व की पावनता, मर्यादा और छत्तीसगढ़ की गौरवशाली लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर गैर-राजनीतिक संगठन छत्तीसगढिया क्रान्ति सेना ने जिला प्रशासन का ध्यान आकर्षित कराया है। संगठन के जिलाध्यक्ष अलेक्जेंडर टोप्पो ने कोरबा जिले के संवेदनशील कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी के माध्यम से एक विनम्र व गंभीर आग्रह पत्र प्रस्तुत करते हुए गरबा व दुर्गा पंडालों में शालीनता, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय लोक कलाओं को प्राथमिकता देने की मांग की है।
जिलाध्यक्ष अलेक्जेंडर टोप्पो ने कलेक्टर महोदय को सौंपे ज्ञापन में उल्लेख किया कि पूरा छत्तीसगढ़ माँ सर्वमंगला, माँ महामाया, माँ दंतेश्वरी और माँ मड़वारानी की पावन साधना स्थली है। ऐसे पावन अवसर पर पंडालों व गरबा स्थलों में कानफोड़ू डीजे पर द्विअर्थी व फूहड़ फिल्मी गीतों और अमर्यादित नृत्यों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। उन्होंने पंचमी तिथि से लेकर विजयादशमी व विसर्जन तक पूरे अनुष्ठान के दौरान प्रशासनिक स्तर पर कड़े दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है।
पारंपरिक परिधानों से संस्कार और मर्यादा को मिलेगा बल ?
जिलाध्यक्ष ने पत्र में स्पष्ट किया कि यह प्रयास किसी के उल्लास को ठेस पहुँचाना नहीं बल्कि हमारी माटी की अस्मिता और आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से जोड़े रखना है। उन्होंने कलेक्टर महोदय से आग्रह किया कि आयोजन स्थलों पर गरिमामय व पारंपरिक वेशभूषा को बढ़ावा दिया जाए l
छत्तीसगढ़ की माटी की पहचान पारंपरिक लुगरा, पोलखा, सूती व कोसा साड़ियां या व्यवस्थित दुपट्टे के साथ शालीन सलवार-सूट व पारंपरिक घाघरा-चोली। इसी तरह युवाओं व पुरुषों के लिए कुर्ता-पायजामा, धोती-कुर्ता अथवा सात्विक पारंपरिक लोक परिधान का आग्रह करते हुए छोटे व अमर्यादित पाश्चात्य परिधानों पर आयोजकों द्वारा संयम बरतने की अपील की गई है।
फूहड़ गानों के बजाय गूंजे जवारा, सुआ व जस गीत
अलेक्जेंडर टोप्पो ने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं भक्ति और साधना के लिए स्वयं में अत्यंत समृद्ध हैं। सिर पर जवारा कलश रखकर माताओं-बहनों द्वारा किया जाने वाला नृत्य गरबा की मूल आराधना शैली से पूरी तरह सामंजस्य रखता है। इसके अलावा सुआ, करमा और पंथी नृत्य तथा मांदर व झांझ की थाप पर गाए जाने वाले पारंपरिक जस गीत वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
छत्तीसगढिया क्रान्ति सेना ने विश्वास व्यक्त किया है कि जिला प्रशासन के सहयोग से जिले भर में नवरात्रि उत्सव न केवल सुरक्षित और शांतिपूर्ण संपन्न होगा, बल्कि लोक संस्कृति और मर्यादा का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रस्तुत करेगा।