पोतरा पंचायत में प्रधानमंत्री आवास योजना पर उठे सवाल, सोशल ऑडिट के बीच ग्राम सभा स्थगितजियो-टैगिंग, आवास निर्माण और मजदूरी भुगतान को लेकर ग्रामीणों ने उठाए सवाल; कोरम पूरा नहीं होने के कारण बैठक स्थगित होने की जानकारी
11 अक्टूबर 2026
संवाददाता : संतोष कुमार चौहान
साइंस वाणी न्यूज़, लैलूंगा
लैलूंगा, रायगढ़। गरीब परिवारों को पक्की छत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के क्रियान्वयन को लेकर रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पोतरा में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, कुछ आवासों के निर्माण की वास्तविक स्थिति, जियो-टैगिंग, राशि के भुगतान और मजदूरी संबंधी प्रविष्टियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच सोशल ऑडिट की प्रक्रिया के दौरान प्रस्तावित ग्राम सभा स्थगित होने से मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित अभिलेखों की जांच, निर्माणाधीन आवासों का भौतिक सत्यापन और जिम्मेदार पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है।
सोशल ऑडिट के बीच ग्राम सभा स्थगित, क्या है वजह?
जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत पोतरा में प्रधानमंत्री आवास योजना से संबंधित सोशल ऑडिट की प्रक्रिया 6 अक्टूबर 2026 से शुरू होने की जानकारी दी गई थी। वहीं, सोशल ऑडिट टीम के 7 अक्टूबर को पंचायत पहुंचने की बात सामने आई है। इसके बाद शनिवार को ग्राम सभा के माध्यम से ऑडिट से संबंधित जानकारी ग्रामीणों के सामने रखे जाने की बात कही गई थी, लेकिन बैठक स्थगित कर दी गई।
इस संबंध में रोजगार सहायक ने फोन पर बताया कि कोरम पूरा नहीं होने के कारण ग्राम सभा की बैठक स्थगित की जा रही है। इस स्पष्टीकरण के बाद बैठक स्थगित होने का कारण बताया गया है, लेकिन अब यह सवाल बना हुआ है कि अगली ग्राम सभा कब आयोजित होगी और सोशल ऑडिट के निष्कर्ष ग्रामीणों के सामने किस तारीख को रखे जाएंगे।
ग्रामीणों को यह जानने की अपेक्षा है कि योजना से संबंधित अभिलेखों, भुगतान विवरण और निर्माण कार्यों की स्थिति की समीक्षा सार्वजनिक रूप से कब की जाएगी।
बिना निर्माण के जियो-टैगिंग और पूर्णता दर्ज करने के आरोप
ग्रामीणों से मिली जानकारी और सामने आई शिकायतों के अनुसार, कुछ मामलों में वास्तविक निर्माण कार्य शुरू होने से पहले जियो-टैगिंग किए जाने तथा योजना की राशि आहरित किए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह आरोप भी सामने आया है कि कुछ आवासों में नींव की खुदाई तक नहीं होने के बावजूद निर्माण की स्थिति आगे बढ़ी हुई अथवा आवास पूर्ण दर्शाए जाने की आशंका है।
इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में मजदूरी भुगतान की प्रविष्टियों और बाद में संबंधित खातों में राशि जमा कराए जाने के दावों को लेकर भी जांच की आवश्यकता बताई जा रही है। एक ही आवास को दो हितग्राहियों के नाम दर्ज किए जाने से संबंधित सवाल भी उठाया गया है, जिसकी पुष्टि संबंधित स्वीकृति एवं भुगतान अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही हो सकेगी।
इन आरोपों की सच्चाई जानने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच आवश्यक है।
- जियो-टैगिंग: संबंधित आवासों की तस्वीरें किस तारीख को और किस निर्माण स्थिति में अपलोड की गई थीं?
- भौतिक निर्माण: क्या स्वीकृत आवासों में वास्तव में निर्माण कार्य हुआ है? यदि हुआ है, तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
- किस्तों का भुगतान: हितग्राहियों को कितनी राशि, किस तारीख को और किस आधार पर जारी की गई?
- मजदूरी भुगतान: भुगतान संबंधी प्रविष्टियों के पीछे वास्तविक कार्य, श्रमिकों की उपस्थिति और संबंधित अभिलेखों का क्या आधार है?
- हितग्राही विवरण: क्या किसी आवास की स्वीकृति अथवा भुगतान में दोहरे नाम की शिकायत सही है?
- राशि जमा कराने का दावा: यदि किसी खाते में राशि वापस जमा कराई गई है, तो उसका बैंक रिकॉर्ड और संबंधित कारण क्या है?
इन बिंदुओं पर मूल अभिलेखों, बैंक विवरणों, जियो-टैगिंग रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान किए बिना किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
सोशल ऑडिट का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत सोशल ऑडिट का उद्देश्य योजना के क्रियान्वयन, लाभार्थियों को मिले लाभ, निर्माण की वास्तविक स्थिति और वित्तीय अभिलेखों की समीक्षा के माध्यम से पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
ऐसे मामलों में स्वीकृति आदेश, किस्त भुगतान का विवरण, जियो-टैगिंग की तस्वीरें, आवास की पूर्णता संबंधी रिकॉर्ड और लागू होने पर मजदूरी भुगतान, मस्टर रोल तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होती है।
यदि सोशल ऑडिट के दौरान कोई विसंगति सामने आती है, तो संबंधित पक्षों से जवाब लेकर निष्कर्षों को प्रमाणों के आधार पर दर्ज किया जाना चाहिए। वहीं, ग्राम सभा का स्थगित होना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि बैठक में सोशल ऑडिट के निष्कर्ष प्रस्तुत किए जाने थे, तो अगली बैठक की तारीख और आगे की प्रक्रिया की सार्वजनिक जानकारी देना पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
अब कागजों के साथ मौके पर भी हो जांच
ग्राम पंचायत पोतरा में उठे सवालों का समाधान निष्पक्ष और तथ्यपरक जांच से ही संभव है। संबंधित विभाग को चाहिए कि शिकायतों में उल्लेखित प्रत्येक आवास का भौतिक सत्यापन कराया जाए तथा जियो-टैगिंग में दर्ज तस्वीरों की तुलना वास्तविक निर्माण स्थिति से की जाए।
इसके साथ ही आवासों की स्वीकृति, किस्तों के भुगतान, मजदूरी संबंधी प्रविष्टियों, बैंक खातों में राशि जमा होने के दावों और आवास की पूर्णता के रिकॉर्ड का मिलान किया जाना चाहिए। यदि जांच में गलत प्रविष्टि, अनियमित भुगतान या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही, जिन लोगों या कर्मचारियों पर आरोप लगाए जा रहे हैं, उनका पक्ष भी लिया जाना चाहिए, ताकि जांच किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष के बजाय प्रमाणों पर आधारित रहे।
अगली ग्राम सभा और सोशल ऑडिट रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
अब ग्रामीणों की निगाहें अगली ग्राम सभा और सोशल ऑडिट की रिपोर्ट पर टिकी हैं। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि उनके गांव में स्वीकृत आवासों की वास्तविक स्थिति क्या है, योजना की राशि का उपयोग किस प्रकार हुआ और सामने आई शिकायतों में कितनी सच्चाई है।
फिलहाल ग्राम सभा स्थगित होने के संबंध में कोरम पूरा नहीं होने की जानकारी सामने आई है, जबकि आवास निर्माण, जियो-टैगिंग और मजदूरी भुगतान से जुड़े आरोपों की पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है कि वह मामले की जांच कर तथ्यों को स्पष्ट करे और ग्रामीणों के सामने निष्कर्ष रखे।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वीकृत आवासों का निर्माण वास्तव में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुआ है, या कहीं अभिलेखों में दर्ज प्रगति और मौके की वास्तविक स्थिति में अंतर है? इसका जवाब केवल पारदर्शी जांच, भौतिक सत्यापन और प्रमाणित अभिलेखों से ही सामने आ सकेगा।