-->
दो लाख की मदद या जवाबदेही से बचने की कोशिश? मीना बाजार हादसे ने खड़े किए सवाल

दो लाख की मदद या जवाबदेही से बचने की कोशिश? मीना बाजार हादसे ने खड़े किए सवाल

 






खरसिया। खरसिया नगर पालिका परिसर में लगे मीना बाजार में 39 वर्षीय नकुल निषाद की मौत ने मेले की सुरक्षा व्यवस्था और जिम्मेदारों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 अक्टूबर 2026 को शाम करीब 4 से 5 बजे के बीच आकाश झूले से गिरने की घटना में वार्ड क्रमांक 04, पठानपारा निवासी नकुल निषाद, पिता राम प्रसाद निषाद, की जान चली गई। इस दर्दनाक घटना के बाद परिवार के सामने दो बच्चों के भविष्य और पालन-पोषण की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।


दो लाख रुपये से क्या लौट आएगी जिंदगी?


यदि परिवार को दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इतनी रकम किसी उजड़े परिवार के भविष्य की गारंटी बन सकती है? क्या बच्चों की शिक्षा, परवरिश और जीवनभर के सहारे की भरपाई चंद रुपयों से संभव है? इंसान की जिंदगी अनमोल है, उसका मूल्य तय करने का अधिकार किसी को नहीं!


आर्थिक सहायता देना संवेदनशीलता हो सकती है, लेकिन इसे हादसे की जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। आखिर आकाश झूले पर सुरक्षा के क्या इंतजाम थे? क्या उपकरणों की तकनीकी जांच हुई थी? क्या संचालन के लिए जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था? इन सवालों के जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।


संचालक की जिम्मेदारी तय होगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?


मृतक का पैतृक गांव पुसौर, जिला रायगढ़ बताया जा रहा है। पोस्टमार्टम के बाद परिजनों ने खरसिया के वार्ड क्रमांक 04 स्थित मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया। परिवार ने किन परिस्थितियों में यह निर्णय लिया, इसकी पुष्टि आवश्यक है।


अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की है। केवल औपचारिक जांच या आर्थिक सहायता की चर्चा से मामला खत्म नहीं होना चाहिए। दुर्घटना के कारणों की निष्पक्ष जांच हो, सुरक्षा संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल की जाए और यदि लापरवाही प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।


प्रशासन से सीधे सवाल


क्या मीना बाजार में सुरक्षा व्यवस्था की नियमित जांच हुई थी? क्या झूला पूरी तरह सुरक्षित था? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने निरीक्षण किया था? और सबसे अहम—क्या नकुल निषाद के परिवार को न्याय मिलेगा?


दो लाख रुपये का सवाल नहीं, दो बच्चों के भविष्य और एक परिवार को न्याय दिलाने का सवाल है! प्रशासन को जवाब देना होगा कि आखिर इस मौत की जिम्मेदारी किसकी है। जांच में देरी या लापरवाही हुई, तो सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल और गहरे होंगे।


अब खरसिया की जनता की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। जरूरत सिर्फ आर्थिक मदद की नहीं, बल्कि सच सामने लाने, जवाबदेही तय करने और ऐसी कार्रवाई की है, जिससे भविष्य में किसी और परिवार का घर इस तरह उजड़ने से बच सके।

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article