लैलूंगा में आदिवासी भूमि नामांतरण को लेकर बड़ा विवाद, तहसीलदार पर गंभीर आरोपकई बार शिकायत पर कार्यवाही शून्य
गोंड जाति की पैतृक भूमि पर रसूखदार ने अपने ड्राइवर के नाम दर्ज करवा ली जमीन हिस्सेदारों को नहीं मिला हिस्सा
कूटरचना कर हिस्सेदारों का नाम विलोपित शासन से उच्चस्तरीय जांच की मांग
लैलूंगा (रायगढ़) — तहसील लैलूंगा क्षेत्र में आदिवासी समाज की बहुमूल्य कृषि भूमि के नामांतरण को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। गोंड जाति के ग्रामीणों ने तहसीलदार लैलूंगा श्री शिवम पाण्डेय पर नियमों की अनदेखी करते हुए हिस्सेदारों का नाम विलोपित करते हुए अन्य हिस्सेदार व्यक्ति के पक्ष में नामांतरण करने का आरोप लगाया है। मामले को लेकर आदिवासी समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है और इसे सुनियोजित षड्यंत्र बताते हुए शासन से निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
आवेदकों द्वारा मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन को सौंपे गए शिकायती आवेदन में बताया गया है कि नगर पंचायत लैलूंगा स्थित भूमि खसरा नंबर 622/12 रकबा 0.210 हेक्टेयर एवं खसरा नंबर 502/6 रकबा 1.000 हेक्टेयर, कुल रकबा 1.290 हेक्टेयर, मूलतः स्वर्गीय जहरसाय गोंड, निवासी पाकरगांव के नाम से दर्ज थी। यह भूमि आदिवासी परिवार की पैतृक संपत्ति रही है।
आवेदन में उल्लेख किया गया है कि जहरसाय गोंड की मृत्यु के पश्चात, उनके वैधानिक उत्तराधिकारियों के स्थान पर छलपूर्वक दूसरे आदिवासी व्यक्ति छत्तरसिंह द्वारा उक्त भूमि पर अधिकार जताते हुए तहसील न्यायालय लैलूंगा में नामांतरण हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया। आरोप है कि तहसीलदार लैलूंगा द्वारा कानून एवं शासन के नियमों को ताक पर रखकर, केवल एक पक्ष के नाम पर नामांतरण कर दिया गया।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस मामले में हल्का पटवारी द्वारा जांच प्रतिवेदन एवं पंचनामा में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया था कि मृतक जहरसाय गोंड के लगभग 14 वारिस जीवित हैं। इसके बावजूद तहसीलदार द्वारा न तो सभी वारिसों को पक्षकार बनाया गया और न ही आदिवासी भूमि संरक्षण कानूनों का पालन किया गया, जो मामले को और भी संदेहास्पद बनाता है। आवेदकों के अनुसार, तहसीलदार लैलूंगा द्वारा दिनांक 09 अप्रैल 2025 एवं 15 सितंबर 2025 को दो आदेश पारित किए गए, जिनमें संपूर्ण भूमि पर केवल एक व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया। यह कार्यवाही छत्तीसगढ़ शासन की आदिवासी हितैषी नीतियों एवं राजस्व नियमों के प्रतिकूल बताई जा रही है। मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब आरोप लगाया गया कि वर्तमान में उक्त भूमि को आगे खरसिया क्षेत्र के व्यक्ति के नाम रजिस्ट्री कर दी गई, जिसमें कथित रूप से लाखों रुपये के स्टाम्प पेपर की चोरी और फर्जीवाड़ा भी शामिल है। इससे पूरे नामांतरण और रजिस्ट्री प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
आवेदनकर्ताओं ने बताया कि इस संबंध में पहले भी अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) लैलूंगा, संयुक्त कलेक्टर रायगढ़ सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित शिकायतें सौंपी गई थीं, लेकिन अब तक कोई ठोस जांच या कार्रवाई नहीं की गई।
आदिवासी समाज के लोगों का कहना है कि यदि इस प्रकार आदिवासियों की भूमि को छलपूर्वक आदिवासियों के नाम दर्ज किया जाता रहा, तो इससे समाज में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी और आदिवासी परिवार अपनी पैतृक संपत्ति से बेदखल होते चले जाएंगे।
आवेदकों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पूरे नामांतरण प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों एवं संलिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए तथा आदिवासी परिवार को उनकी पैतृक भूमि पर पुनः अधिकार दिलाया जाए।
फिलहाल यह मामला प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है और क्षेत्रीय लोगों की निगाहें शासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
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