लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सामने नई चुनौती
15 जुलाई 2026
पत्रकारों का विशेष दर्जा समाप्त, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सामने नई चुनौती
भारत में श्रम कानूनों में किए गए व्यापक सुधारों के तहत 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित कर चार नई श्रम संहिताएँ बनाई गई हैं। सरकार ने इसे श्रम सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है, लेकिन इन बदलावों का एक महत्वपूर्ण प्रभाव देश के पत्रकारों पर भी पड़ा है। वर्षों तक विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त करने वाले पत्रकार अब एक अलग कानून के बजाय सामान्य श्रम व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं। यह परिवर्तन केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से जुड़ा गंभीर विषय भी है।
स्वतंत्र भारत में पत्रकारों की भूमिका को देखते हुए वर्ष 1955 में कार्यरत पत्रकारों के लिए अलग कानून बनाया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि समाचार संकलन, सत्ता से सवाल और जनहित के मुद्दों को उठाने वाले पत्रकार आर्थिक असुरक्षा, मनमानी सेवा शर्तों और संस्थागत दबाव का शिकार न हों। पत्रकारों के कार्य घंटे, अवकाश, सेवा शर्तें और अन्य अधिकारों को विशेष संरक्षण प्राप्त था।
नई श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद यह पृथक व्यवस्था समाप्त हो गई और पत्रकारों को सामान्य श्रमिकों की व्यापक श्रेणी में शामिल कर दिया गया। सरकार का तर्क है कि इससे अधिकार खत्म नहीं हुए हैं, बल्कि उन्हें नई संहिताओं में समाहित किया गया है तथा इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों को भी कानूनी दायरे में लाया गया है। दूसरी ओर, अनेक पत्रकार संगठन इसे पत्रकारों की विशिष्ट पहचान और विशेष सुरक्षा के कमजोर होने के रूप में देखते हैं।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकार श्रमिक हैं या नहीं। निस्संदेह पत्रकार भी श्रमिक हैं और उन्हें श्रम अधिकार मिलने चाहिए। लेकिन पत्रकार का दायित्व केवल अपने संस्थान के लिए कार्य करना नहीं है; वह लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का माध्यम भी है। जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार उजागर करता है, प्रशासन से सवाल पूछता है या जनहित के मुद्दों को सामने लाता है, तब उसका कार्य सामान्य रोजगार संबंधों से कहीं अधिक संवेदनशील हो जाता है।
आज मीडिया उद्योग तेजी से बदल रहा है। डिजिटल मीडिया का विस्तार हुआ है, अनुबंध आधारित नियुक्तियाँ बढ़ी हैं और कई संस्थानों में नौकरी की स्थिरता पहले जैसी नहीं रही। ऐसे समय में यदि पत्रकारों के लिए विशेष सेवा सुरक्षा कमजोर पड़ती है, तो इसका सीधा असर स्वतंत्र पत्रकारिता पर पड़ सकता है। आर्थिक असुरक्षा और नौकरी का भय निष्पक्ष पत्रकारिता की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं होती, बल्कि एक स्वतंत्र, निर्भीक और सुरक्षित पत्रकारिता से भी होती है। यदि पत्रकार स्वयं असुरक्षित होंगे, तो सत्ता से कठिन प्रश्न पूछने का साहस भी प्रभावित होगा। इसलिए आवश्यक है कि नई श्रम संहिताओं के अंतर्गत पत्रकारों के लिए सेवा सुरक्षा, कार्यस्थल संरक्षण, उचित कार्य समय, सामाजिक सुरक्षा और संपादकीय स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
यह भी समय की मांग है कि केंद्र सरकार, मीडिया संस्थान और पत्रकार संगठनों के बीच व्यापक संवाद हो। यदि नई व्यवस्था में कोई व्यावहारिक कमी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए, ताकि श्रम सुधारों का उद्देश्य भी पूरा हो और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी सशक्त बना रहे।
पत्रकारों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि मजबूत कानूनी संरक्षण और सुरक्षित कार्य वातावरण से सुनिश्चित होता है। श्रम सुधारों का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब देश का प्रत्येक पत्रकार निर्भीक होकर जनहित में कलम चला सके। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे मजबूत आवाज़ वही होती है, जो बिना भय और बिना दबाव के सच लिखने का साहस रखती है।
यदि इसे किसी समाचार पत्र के मुख्य संपादकीय के स्तर पर
खरसिया के निर्भीक पत्रकार डिग्री लाल सिदार हमेशा लिखते हैं कि
अधिक धारदार, तथ्यप्रधान तथा विचारोत्तेजक बनाना हो, तो उसका विस्तृत संस्करण भी तैयार किया जा सकता है।
विशेष संवाददाता छत्तीसगढ़ यशोदा यादव