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  एक शिकायत और हिली पंचायत व्यवस्था, पिरदा पंचायत जांच में लाखों रुपये की कटौती की अनुशंसा

एक शिकायत और हिली पंचायत व्यवस्था, पिरदा पंचायत जांच में लाखों रुपये की कटौती की अनुशंसा


 एक शिकायत और हिली पंचायत व्यवस्था, पिरदा पंचायत जांच में लाखों रुपये की कटौती की अनुशंसा!


सरकारी जांच में सामने आईं निर्माण कार्यों की कमियां, 9.61 लाख की कटौती की अनुशंसा!


"सरकारी जांच में तीन नाली निर्माण कार्यों में 9.61 लाख रुपये की कटौती की अनुशंसा, अब जिम्मेदारों पर कार्रवाई का इंतजार"



सारंगढ़-बिलाईगढ़ :- यदि कोई जागरूक नागरिक ठान ले तो व्यवस्था को जवाब देना ही पड़ता है। ग्राम पंचायत पिरदा में मनरेगा के तहत कराए गए आरसीसी नाली निर्माण कार्य इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आया है। ग्राम भिनोदा निवासी गोपी अजय द्वारा CPGRAMS पोर्टल पर दर्ज एक शिकायत ने उन निर्माण कार्यों को जांच के दायरे में ला दिया, जिन पर सरकारी धन खर्च हो चुका था। जांच पूरी होने के बाद जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पंचायत स्तर पर कराए गए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


जनपद पंचायत बिलाईगढ़ द्वारा कराए गए तकनीकी मूल्यांकन में तीन अलग-अलग नाली निर्माण कार्यों का पुनर्मूल्यांकन किया गया। जांच में स्वीकृत कार्य और स्थल पर उपलब्ध कार्य में अंतर पाए जाने के बाद लोहरिनडीपा तालाब से भोरकाडीपा की ओर बने नाली निर्माण कार्य में 4.06 लाख रुपये, भोरकाडीपा से नाला तक बने नाली निर्माण कार्य में 2.68 लाख रुपये तथा डीपापारा से सामुदायिक भवन की ओर बने नाली निर्माण कार्य में 2.87 लाख रुपये की कटौती प्रस्तावित की गई। यानी केवल तीन कार्यों में ही कुल 9.61 लाख रुपये की कटौती की अनुशंसा करनी पड़ी। इसके बाद जिला पंचायत सारंगढ़-बिलाईगढ़ ने भी आधिकारिक पत्र जारी कर उक्त कटौती को विलोपन की कार्रवाई के लिए कलेक्टर को भेज दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायत नहीं होती तो क्या इन निर्माण कार्यों का दोबारा तकनीकी परीक्षण होता? क्या लाखों रुपये की यह कटौती कभी सामने आती? सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि शिकायत के बाद ही जांच हुई, पुनर्मूल्यांकन हुआ और फिर कटौती की अनुशंसा की गई। यह घटनाक्रम बताता है कि विकास कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जनभागीदारी और शिकायत तंत्र कितने महत्वपूर्ण हैं। यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उन तमाम विकास कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़ा करता है, जिनका भुगतान सरकारी राशि से किया जाता है। जब कार्यों का तकनीकी परीक्षण और माप पुस्तिका के आधार पर भुगतान किया जाता है, तब ऐसी स्थिति कैसे बनी कि बाद में पुनर्मूल्यांकन कर लाखों रुपये की कटौती प्रस्तावित करनी पड़ी? यह सवाल अब प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़ा है।


फिलहाल ग्रामीणों की नजर अब आगे की कार्रवाई पर है। क्या प्रस्तावित कटौती के बाद जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी, शासकीय राशि की वसूली होगी और दोष पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई होगी, या मामला केवल पत्राचार और फाइलों तक सीमित रह जाएगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई से ही मिलेगा। हालांकि इतना तय है कि एक शिकायत ने न केवल लाखों रुपये के सरकारी कार्यों की जांच कराई, बल्कि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की गुणवत्ता पर भी नई बहस छेड़ दी है।

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