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बड़ी प्रतिमाएं बैठाने से पहले सोचो, विसर्जन के लिए मुंबइया समुद्र कहां से लाओगे?*

बड़ी प्रतिमाएं बैठाने से पहले सोचो, विसर्जन के लिए मुंबइया समुद्र कहां से लाओगे?*

अजय कुमार बियानी, सेवानिवृत्त अभियंता

इंदौर में गणेशोत्सव की भव्यता हर साल नया रूप ले रही है। गली-मोहल्लों से लेकर प्रमुख चौराहों तक बड़ी-बड़ी गणेश प्रतिमाएं स्थापित हो रही हैं। सजावट बढ़ रही है, आयोजन भव्य हो रहे हैं और श्रद्धा का उत्साह भी चरम पर है। लेकिन इसी भव्यता के बीच एक सवाल जरूरी है—इन विशाल प्रतिमाओं का विसर्जन आखिर कहां और कैसे होगा?
मुंबई की तरह इंदौर के पास समुद्र नहीं है। हमारे पास सीमित जलस्रोत हैं, जिनका संरक्षण आने वाले समय की बड़ी जरूरत है। ऐसे में प्रतिमा की ऊंचाई और सजावट के साथ उसके विसर्जन की व्यवस्था पर विचार करना भी उतना ही जरूरी है।
अपन इंदौरी भिया, गणपति बप्पा की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं तो खूब बैठा दोगे, पण विसर्जन के लिए मुंबइया समुद्र कहां से लेकर आओगे?
सवाल आस्था पर नहीं, आस्था के साथ जुड़ी जिम्मेदारी पर है। बप्पा को भव्य रूप में विराजित करना श्रद्धा का विषय है, लेकिन उन्हें सम्मानपूर्वक और पर्यावरण के अनुकूल विदा करना भी उसी श्रद्धा का हिस्सा होना चाहिए।
मुंबई की भौगोलिक स्थिति अलग है। वहां समुद्र है और बड़े पैमाने पर प्रतिमा विसर्जन की व्यवस्थाएं वर्षों में विकसित हुई हैं। इंदौर में समुद्र नहीं है। यहां तालाब और अन्य सीमित जलस्रोत हैं। इसलिए मुंबई की देखादेखी प्रतिमाओं की ऊंचाई बढ़ाने से पहले इंदौर के संसाधनों और विसर्जन व्यवस्था को देखना जरूरी है।
मुंबई में समुद्र देखकर प्रतिमा बड़ी करना आसान है, इंदौर में जलस्रोत देखकर प्रतिमा का आकार तय करना समझदारी है।
इंदौर की गणेशोत्सव परंपरा केवल प्रतिमाओं तक सीमित नहीं है। अनंत चतुर्दशी की झांकी परंपरा शहर की सांस्कृतिक पहचान है। वर्षों से लोग झांकियां देखने उमड़ते रहे हैं। समय के साथ झांकियां अधिक भव्य हुईं और तकनीक ने उन्हें नया रूप दिया। अब कई क्षेत्रों में बड़ी गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने की होड़ भी दिखाई देती है।
भव्यता में कोई बुराई नहीं, लेकिन स्थापना की योजना बनाते समय विसर्जन की योजना पीछे नहीं छूटनी चाहिए।
बड़ी प्रतिमा बैठाने से पहले बड़ा सवाल होना चाहिए—विसर्जन की व्यवस्था कहां है?
घर में स्थापित छोटी प्रतिमा के विसर्जन की व्यवस्था तक कई बार चुनौती बन जाती है। ऐसे में एक ही क्षेत्र में बड़ी संख्या में विशाल प्रतिमाओं के लिए विसर्जन स्थल, यातायात, सुरक्षा और सफाई की समुचित योजना पहले से होना जरूरी है।
यह जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं है। आयोजकों, सामाजिक संस्थाओं और नागरिकों की भी है।
गणेशजी को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। फिर उनकी स्थापना के साथ विवेक को बाहर क्यों छोड़ दें?
अपन इंदौरी अंदाज में कहें तो—बप्पा को बुलाया है भिया, तो बप्पा की सीख भी मान लो।
प्रतिमा मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री से बने, विसर्जन निर्धारित व्यवस्था में हो और जलस्रोत सुरक्षित रहें—तो आस्था और पर्यावरण दोनों साथ चल सकते हैं।
जलस्रोत केवल विसर्जन की जगह नहीं हैं। वही हमारे जीवन का आधार हैं। इसलिए तालाबों और अन्य जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाना आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है।
विसर्जन के बाद फूल-माला, सजावटी सामग्री और अन्य कचरे की सफाई भी उतनी ही जरूरी है। आयोजन समिति को पहले ही तय करना चाहिए कि प्रतिमा के साथ आने वाली सामग्री का निपटारा कैसे होगा और विसर्जन स्थल की सफाई कौन करेगा।
एक सवाल और—क्या भक्ति का मतलब केवल बड़ी प्रतिमा है?
क्या छोटी मिट्टी की प्रतिमा में श्रद्धा कम हो जाती है? क्या सामूहिक पूजा, पौधारोपण, रक्तदान, जरूरतमंदों की सहायता और स्वच्छता को गणेशोत्सव का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता?
प्रतिमा की ऊंचाई से बड़ा हमारा संकल्प क्यों नहीं हो सकता?
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। ऐसे में उत्सवों में भी स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी दिखनी चाहिए।
उत्सव पूरे उत्साह से मनाइए। आरती कीजिए, ढोल बजाइए, झांकी सजाइए और बप्पा को श्रद्धा से विराजित कीजिए। लेकिन इतना भी ध्यान रखिए कि उत्सव समाप्त होने के बाद शहर को उसकी कीमत न चुकानी पड़े।
उत्सव म्हारा है, पण जलस्रोत भी म्हारे हैं।
चंदे और भव्यता की होड़ से ज्यादा जरूरी जिम्मेदार आयोजन की होड़ हो। मोहल्ले में सबसे बड़ी प्रतिमा लगाने से नाम मिल सकता है, लेकिन पर्यावरण बचाने और समाज के लिए काम करने से सम्मान मिलता है।
आखिर बप्पा का संदेश भी तो यही है—सृजन से विसर्जन तक हर कदम विवेक के साथ उठाना।
इसलिए अगली बार किसी चौराहे पर बहुत बड़ी गणेश प्रतिमा दिखाई दे तो केवल यह मत पूछिए—कितनी ऊंची है?
एक सवाल और पूछिए—
“भिया, विसर्जन की तैयारी कितनी बड़ी है?”
क्योंकि गणपति की भव्यता केवल प्रतिमा की ऊंचाई में नहीं, हमारी जिम्मेदारी की ऊंचाई में दिखाई देनी चाहिए।
बप्पा को श्रद्धा से बैठाएं, विवेक से विदा करें।
आस्था भी बचाएं, जलस्रोत भी।
उत्सव भी मनाएं, इंदौर का भविष्य भी।
यही हो अपन इंदौर की पहचान—उत्सव में उमंग, परंपरा में गौरव और जिम्मेदारी में सबसे आगे।
गणपति बप्पा मोरया!

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