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जनकवि कोदूराम 'दलित' जी की "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" गांधीवादी विचारधारा एवं देश प्रेम के भाव से सजी कृति📘 है।



   जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में महान कार्य, समाज सेवा, ज्ञान, या उच्च विचार छोड़ जाता है, तो उसका नाम दुनिया में जीवित रहता है। उदाहरण के लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी, महात्मा गांधी जी जैसे लोग अपने कर्मों के कारण अमर माने जाते हैं।
    उसी प्रकार कुछ साहित्यकार ऐसे होते हैं जो अपनी लेखनी के कारण अमर हो जाते हैं। कोदूराम 'दलित' जी उन्हीं साहित्यकारों में से एक हैं। उनकी लेखन शैली, रचनाओं एवं विचारधाओं के कारण ही उन्हें छत्तीसगढ़ का जनकवि कहा जाता है। गांधी वादी विचारधारा एवं देश प्रेम के भाव से उनकी अनुपम लेखनी से सृजित अनमोल रचनाओं से सजी कृति है "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय"। इसका संपादन एवं प्रकाशन उनके पंचतत्व में विलीन के पश्चात उनके रचनाओं का संकलन करके उनके सुपुत्र आ.अरुण कुमार निगम जी एवं जनकवि लक्ष्मण मस्तूरिहा के द्वारा कराया गया है। यह कृति तीन काव्य खण्डों में विभाजित है जिसमें प्रथम हिंदी काव्य खण्ड, द्वितीय छत्तीसगढ़ी काव्य खण्ड एवं तृतीय बाल कविता खण्ड है।
   प्रथम कविता 'राह उन्हीं की चलते जावें' को पढ़ने से ही आपको पता चल जाएगा कि आ. कोदूराम 'दलित' की लेखनी में ऐसा आकर्षण है कि आप पढ़ना प्रारंभ करेंगे तो उसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएँगे।

"जो अपने सारे सुख तजकर, 
     जन-हित करने में जुट जावें।
दूर विषमताएँ कर-कर के, 
      जो समाज में समता लावें। 
जन-जागरण ध्येय रख अपना, 
     घर-घर जाकर अलख जगावें।
उनके अनुगामी बनकर हम,
     राह उन्हीं की चलते जावें।"   

  भारतीय संस्कृति में गुरु के 'सर्वोच्च स्थान' को रेखांकित करती यह काव्यात्मक पंक्तियाँ हैं -
"भ्राता, पिता, मित्र, भगवान इन सबसे गुरुदेव महान।
 देकर के विद्या का दान गढ़े शिष्य जो प्रतिभावान।
 सब ग्रन्थों में मिले प्रमाण गुरु का है सर्वोच्च स्थान।"

 'कविता और कवि' शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा है कि - 
  "कविता करना आसान नहीं।
  कवि पैदा होकर आता है,
  होती कवियों की खान नहीं।"

'श्रम का सूरज' श्रम की महत्ता को दर्शाती पंक्ति दृष्टव्य है -
  "श्रम का सूरज उगा, बीती विकराल रात, 
 भागा घोर तम, भोर हो गया सुहाना है।
 आलस को त्याग-अब जाग रे श्रमिक, 
 तुझे-नये सिरे से नया भारत सिरजाना है।"

 'होता है उसका सम्मान' कविता की पंक्तियाँ कृषक पर ध्यान केंद्रित कराती हुई है- 
"लहू-पसीना करके एक। उपजाता है फसल अनेक।
क्या जुआर, क्या गेहूं-धान। होता है उसका सम्मान।।"

 'गणतन्त्र पर्व' पराधीनता के पश्चात स्वतंत्र भारत में गणतंत्र पर्व पर भारत वर्ष हर्षित है उसे उन्होंने अपनी लेखनी से बताया है - 
  "भारत के आज जन-जन फूले नहीं समाते,
  भारत के आज कण-कण फूले नहीं समाते,
  भारत का कोना-कोना है आज जगमगाया,
  गणतंत्र पर्व आया गणतंत्र पर्व आया।"

 छत्तीसगढ़ के पावन धरा को समर्पित 'छत्तीसगढ़ वन्दना' है - 
"बन्दों छत्तीसगढ़ शुचिधामा। परम मनोहर सुखद ललामा।
 जहाँ सिहावादिक गिरिमाला। महानदी जहँ बहति विशाला।।"

 तीन कवित्त में से एक कवित्त 'भिन्न-भिन्न प्रकार के भगत' से पंक्तियाँ हैं कि -
 "कोई हैं भगत कुरसी के, धरा-धाम के
 तो कोई हैं भगत भैया, गोरे-गोरे चाम के।
 कोई हैं भगत पेपरों में छपे नाम के
 तो कोई घुसखोरी-भ्रष्टाचार के, तमाम के।"

 छत्तीसगढ़ी काव्य खण्ड में सर्वप्रथम 'गजानन वंदना' है।उसके पश्चात पुस्तक के शीर्षक को सार्थक करती बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय की पंक्तियाँ हैं -
"प्रकृति हर पाँच तत्व सिरजिस 
आगी, पानी, भुइयाँ, अगास 
अउ पवन-एक ले एक जबर 
पर ये ककरो बर नोहयँ खास 
चन्दा सुरुज चमकय दमकयँ 
बरसय बदरी मल्हार गाय 
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।"

 'धन्य बबा गाँधी' में उन्होंने महात्मा गांधी जी के बारे में लिखा है - 
 "चरखा-तकली, चला-चला के खद्दर पहिने ओढ़े।
   धन्य बबा गाँधी, सुराज ला ले ये तब्भे छोड़े।"

 एकता के सूत्र में बंधने का आवाह्न करते 'तरि नारि नाना' - 
"तरि नारि नाना हरि नाना गोसाई !
आपस के झगरा होथय दुखदायी !!
ये मोर हिन्दू - मुसलमान भाई !
काबर करत रहिथौ झगरा-लड़ाई ?"

जागरण-गीत है - 
 "अब तोर देश के खुलिस भाग। 
 झन सुत सँगवारी, जाग-जाग।"

 अटल बिहारी वाजपेई बिलासपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य विषयांतर्गत सम्मिलित 'चउमास' कविता के अंश है - 
"गील होगे माटी चिखला बनिस धुर्रा हर 
बपुरी बसुधा के बुताइस पियास हर 
हरियागे भुइयाँ सुग्घर मखमल साहीं
जामिस हे बन उल्होइस काँदी-घास हर
जोहत रहिन गंज दिन ले जेकर बाँट 
खेतिहर मन के पूरन होगे आस हर 
सुरुज लजा के झाँके बपुरा ह कभू-कभू 
"रस बरसइया आइस चउमास हर"!

 "दाई, बासी देबे कब ?" माँ बेटे के अनुपम वार्तालाप पर आधारित गीत है - 
 दाई ! बासी देबे कब ? बेटा पढ़ के आबे तब
 पढ़ लिख के दाई, मैं ह हो जाहूँ हुसियार
 तोला देहूँ रे बेटा, मीठ-मीठ कुसियार
 खाबे हब-हब
 मजा पाबे रे गजब
 बेटा, पढ़ के आबे तब
 दाई, बासी ..

  हिन्दुस्तान को देवभूमि कहते हुए उन्होंने 'हिन्दुस्तान' कविता में लिखा है कि 
 "भगवान जिहाँ अउँतरत रथय 
  वो भुइयाँ हिन्दुस्तान आय।"

 तृतीय खण्ड बाल कविता खण्ड है जिसके 'अच्छा बालक' रचना की कुछ पंक्ति है कि - 
 "अच्छा बालक पढ़ लिखकर बन जाता है विद्वान।
 अच्छा बालक सदा बड़ों का करता है सम्मान।"
 
 'मेरा घोड़ा' कविता में बाल पन का मनमोहक भाव परिलक्षित होता है - 
"देखो तो यह मेरा घोड़ा, 
कितना सुन्दर दिखता है।
सादी, दुलकी, सरपट चाले 
जो सिखलाऊँ सिखता है।
घने बाल इसकी गर्दन पर
पूँछ चॅवर सी प्यारी है।"

      'चुनाव-जंग' कविता चुनाव के समय की एक झाँकी है। 'नोनी के बिहाव' में बेटी के विवाह के समय का सुंदर दृश्यांकन है। इनके अलावा हिंदी भाषा, काला, स्वतंत्र भारत के राजा, सिर्फ नाम रह जाना है, चन्दा, चलो जेल संगवारी, हमर लोकतंतर, सुग्घर राज बनाबो, सुग्घर गाँव के महिमा, होली-तिहार, राखी के परन, धान लुवाई, वीर बालक की दहाड़, आया विमान इत्यादि रचनाएँ भी है जो सुधी पाठकों के हृदय को स्वत: प्रभावित करती हैं।
     यह कृति देश-प्रेम, गुरु-वंदना, व्यंग्य, नीति परकता, समाज सुधार के भाव, जागरण गीत, संबंधों की आत्मीयता, भक्ति-भाव, प्रकृति-चिंतन, ग्रामीण परिदृश्य, मानवीय संवेदनाएँ, जीवन-दर्शन, समर्पण, बालमन की स्थिति जैसे विविध भावों को समेटे छंदमुक्त एवं छंदबद्ध रचनाओं जैसे दोहा, कवित्त, सवैया इत्यादि से सजी हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी की विशुद्ध साहित्यिक संकलन है।
     इस काव्य संग्रह की भूमिका ओज के कवि आ. हरि ठाकुर जी ने लिखी है। यह अनेकता में एकता के मंत्र को चरितार्थ करती हुई काव्य-संग्रह है। उनकी लेखनी को नमन करते हुए काव्यांजलि स्वरूप उनको समर्पित चंद पंक्तियाँ - 

गांधीवादी विचारधारा, में रचकर साहित्य।
सृजन सर्वहितकारी करके, बढ़ा गए लालित्य।
हास्य-व्यंग्य के बाण मार वे, मन लेते थे मोह,
अपनी रचनाओं के कारण, अमर रहेंगे नित्य।

  *✍️लोको पायलट-संतोष मिरी 'हेम'* 
            कोरबा (छत्तीसगढ़) 
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