किसान की आवाज उठाना पड़ा भारी: देश कर्तव्य मीडिया के संपादक के साथ सरकारी दफ्तर में मारपीट”
सारंगढ़-बिलाईगढ़।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर एक बार फिर खुला हमला देखने को मिला, जब देश कर्तव्य मीडिया के मुख्य कार्यकारी संपादक पोषराम साहू के साथ सरकारी कार्यालय के अंदर ही घोर मारपीट की घटना सामने आई।
घटना दिनांक 16 अप्रैल 2026, सुबह लगभग 10:30 बजे की है, जब पोषराम साहू, वकील जनक बरेठ के साथ उनकी माता जी के PM किसान सम्मान निधि से जुड़ी समस्या को लेकर जिला कृषि विकास विभाग कार्यालय पहुंचे थे। उद्देश्य साफ था—किसान की समस्या का समाधान और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब लेना।
शुरुआत में उप संचालक कृषि अधिकारी आशुतोष श्रीवास्तव से शालीनतापूर्वक चर्चा हुई। उनके निर्देश पर REO अधिकारी प्रवीण पटेल को बुलाया गया और सभी को दूसरे कमरे में ले जाया गया, जहां मामले पर बातचीत शुरू हुई।
पत्रकार द्वारा किसान के लंबित आवेदन का हवाला देते हुए समाधान की मांग की गई और स्पष्ट कहा गया कि यदि समस्या का निराकरण नहीं होता है, तो मामला कलेक्टर तक ले जाया जाएगा।
बस यहीं से माहौल बदल गया।
आरोप है कि REO अधिकारी प्रवीण पटेल अचानक आपा खो बैठे और बिना किसी चेतावनी के पोषराम साहू का कॉलर पकड़कर उन पर टूट पड़े। घोर गंभीर मारपीट की गई, जैसे किसी अपराधी के साथ व्यवहार किया जाता है। इस हमले में न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी गंभीर आघात पहुंचा।
हैरानी की बात यह रही कि घटना के समय वहां मौजूद पूरा स्टाफ और खुद उप संचालक अधिकारी आशुतोष श्रीवास्तव सब कुछ देखते रहे, लेकिन किसी ने भी हस्तक्षेप कर मारपीट रोकने की कोशिश नहीं की। पूरा घटनाक्रम एक तरह से “सिस्टम की मौन सहमति” को उजागर करता है।
मारपीट के दौरान पत्रकार को जबरन रोका गया, बंधक जैसी स्थिति में रखा गया और उनके पेशे का मजाक उड़ाते हुए डराने-धमकाने का प्रयास किया गया। सवाल पूछना जैसे इस सिस्टम में अपराध बन चुका है।
सबसे अहम बात—पूरी घटना कैमरे में कैद है। वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं, जो सच्चाई को सामने लाने के लिए काफी हैं।
यह घटना न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला है, बल्कि सीधे तौर पर भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला है।
अब बड़ा सवाल यह है—
क्या किसान की आवाज उठाना गुनाह है?
क्या सरकारी दफ्तरों में सच बोलने की सजा मारपीट है?
अगर इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगी।

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