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प्रकृति की गोद में बसता; कौंदकेरा गाँव"



ग्राम कौंदकेरा अपनी प्राकृतिक सुन्दरता, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक एकता के लिए विशेष पहचान रखता है। लगभग 700 की जनसंख्या वाला यह गाँव जंगल और नदी के किनारे बसा हुआ है। 

*सामाजिक दृष्टिकोण*

सामाजिक दृष्टि से यहाँ हिंदुत्व का प्रभुत्व है कुछ ऐसे परिवार है जिन्होंने समय के साथ ईसाई धर्म को अपनाया है। इसके बावजूद गाँव में सामाजिक एकता बनी हुई है। कुर्मी, तेली, गोंड, राउत जाति के लोग यहाँ निवास करते है जिसमे तेली जाति के लोगो की बहुलता है।

*साक्षरता*

गाँव की साक्षरता दर पुरुषों में लगभग 70% तथा महिलाओं में 60 से 65% के बीच है।
हालांकि महिलाओं की शिक्षा में कमी का प्रमुख कारण कम उम्र में विवाह की परंपरा है, जिसके चलते अनेक बालिकाएं अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने को विवश हो जाती है।
गाँव में एक प्राथमिक शाला तथा एक माध्यमिक विद्यालय है जहाँ अन्य गाँव के विद्यार्थी भी पढ़ाई करने आते है। बच्चो की प्रारंभिक शिक्षा एवं पोषण हेतु दो आंगनबाड़ी भी संचालित है। गाँव में एक ग्राम पंचायत है, जहाँ राजनीतिक मीटिंग समय समय पर होती है।

*आर्थिक स्थिति*

आर्थिक दृष्टि से गाँव संतुलित स्थिति में है यहाँ भुखमरी जैसी समस्या नहीं है। और अधिकांश लोग खेती–किसानी एवं पशुपालन से जुड़े हुए है। यहाँ की मुख्य फसल धान है।
कुछ लोग व्यापार के माध्यम से एवं कुछ लोग सरकारी एवं निजी संस्थान में आर्थिक रूप से निर्भर है।

*जल संसाधन*

कौंदकेरा में जल संसाधन की दृष्टि से तीन तालाब है तथा सरकारी नल की व्यवस्था है। गाँव के एक तालाब में वर्तमान समय में पुनः खोदन कार्य चल रहा है। उल्लेखनीय बात यह है कि इस कार्य से निकली लगभग 3 से 4 हजार ट्रक मुरूम को गाँव वासियों ने निः शुल्क रूप से सड़क निर्माण हेतु प्रदान किया है जिससे तुमगाँव से लेकर कौंदकेरा तक सड़क निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
शेष 2 तालाब स्वच्छ और उपयोगी है। जहाँ ग्रामीण दैनिक स्नान और अन्य कार्यों के लिए उपयोग करते है।
इसके अतिरिक्त गाँव के बुजुर्गो द्वारा निर्मित एक बांध वर्षा जल संचयन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। जिसका जल कृषि कार्यों में उपयोग किया जाता है।

*पशुपालन*

गाँव में गोठान ग्रामीण पशुपालन का महत्वपूर्ण केंद्र है। जहाँ किसानों द्वारा मवेशियों के लिए चारे का प्रबंध किया जाता है। लगभग 40% परिवार गाय, बकरी पालन से जुड़े हुए है।

*आस्था*

गाँव के मध्य में पुराना विशाल पीपल वृक्ष है जिसके समीप हनुमान मंदिर और मानस भवन है। इसी मानस भवन में विगत 69 वर्षो से नवरात्रि के अवसर पर 4 से 5 दिवसीय श्री रामलीला का आयोजन किया जाता है, तथा दीपावली में पूरे गाँव वाले मिलकर इसी स्थान पर गौरा गौरी पूजन संपन्न करते है जो गाँव की सांस्कृतिक एकता को सुदृण करता है।
खेतों और जंगल के मध्य स्थित सोनई–रुपई माता का मंदिर तथा गाँव के चौक चौक में 2 शिव मंदिर 3 हनुमान मंदिर है जो ग्रामीणों की गहरी आस्था का केंद्र है। 

*प्राकृतिक संपदा*

प्राकृतिक दृष्टि से यह गाँव अत्यंत समृद्ध है। यहाँ का जंगल औषधीय और फलदार वृक्षों से भरपूर है, जिनमें हरड़ (Haritaki), बहेड़ा, नीम, पीपल, जैसे औषधिय पौधे तथा चार, तेंदू, आंवला, जाम, महुआ, आम जैसे फलदार वृक्ष शामिल है।
यद्यपि पहले यहाँ हिरण जैसे वन्य जीव दिखाई देते दिखाई देते थे, परंतु अब वे विलुप्त हो चुके है। और जंगल भी धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। फिर भी आज भी यहाँ जंगली जीव बरहा, हुर्रा दिखाई देते है। गाँव में एक नर्सरी भी स्थापित है जहाँ विभिन्न प्रकार के पौधों का संरक्षण एवं संवर्धन होता है। 

*संचार*

परिवहन और संपर्क की दृष्टि से कौंदकेरा संतोषजनक स्थिति में है, गाँव की सड़कों की स्थिति भी ठीक है।गाँव से शहर लगभग 7 किलोमीटर की दूरी में है, जिससे आवागमन सुगम बना रहता है। गानंव में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, जो आधुनिक संचार को आसान बनाता है।
हालांकि कौंदकेरा अनेक विशेषताओं से परिपूर्ण है।

*चुनौतियां*

परंतु कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने है– 
गाँव में साफ सफाई की कमी है तथा बच्चों, युवाओं और बुजुर्गो में तेजी से बढ़ती नशे की प्रवृत्ति चिंताजनक है।
इसके पीछे पास में स्थित शराब भट्टी, बुरी संगति, मोबाइल फोन का दुरुपयोग तथा पारिवारिक संवाद की कमी और जागरूकता का अभाव प्रमुख कारण दिखाई देता है।
कौंदकेरा में एक ओर उसकी समृद्ध परंपराएं, प्राकृतिक संपदा और सामुदायिक भावना उसे विशिष्ट बनाती है वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियां और बदलती हुई जीवनशैली नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रही है। समय रहते इन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

        ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'

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