मानवता का संदेश: सभी धर्मों से भिन्न है सतनाम धर्म की शिक्षाएँ – डॉ. चंद्रकांत सोनवानी
सरसींवा (सारंगढ़-बिलाईगढ़) :- भारतीय समाज की विविध धार्मिक परंपराओं के बीच सतनाम धर्म एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन के रूप में उभरा है, जिसका मूल आधार सत्य, समानता और मानवता है। डॉ. चंद्रकांत सोनवानी ने कहा कि सतनाम धर्म की स्थापना गुरु घासीदास ने उस समय की, जब समाज में जातिगत भेदभाव और अंधविश्वास गहराई से फैले हुए थे। उन्होंने “सतनाम” को जीवन का मूल मंत्र बताते हुए सत्य को ही परम सत्ता माना।
सतनाम धर्म सादगी, नैतिक जीवन और समानता पर जोर देता है। इसमें जाति-भेद, ऊँच-नीच और बाहरी आडंबर का विरोध करते हुए सत्य, करुणा और आत्म-सुधार को महत्व दिया जाता है। वहीं हिंदू धर्म प्राचीन और व्यापक परंपरा है, जिसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा, विभिन्न दर्शन और अनुष्ठानों की समृद्ध परंपरा देखने को मिलती है।
डॉ. सोनवानी के अनुसार, सतनाम धर्म और हिंदू धर्म के बीच मुख्य अंतर उनकी सामाजिक और धार्मिक अभिव्यक्ति में दिखाई देता है। सतनाम धर्म सत्य को ही ईश्वर मानता है और मूर्ति-पूजा को आवश्यक नहीं मानता, जबकि हिंदू धर्म में विभिन्न पूजा-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। सतनाम धर्म मानव समानता और सरल जीवन को सर्वोच्च मानता है।
उन्होंने कहा कि सतनाम परंपरा ने वंचित वर्गों में आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना को मजबूत किया है। आज के समय में भी सत्य, समानता और मानवता जैसे मूल्य समाज में शांति और भाईचारे के लिए अत्यंत जरूरी हैं।
संदेश: “सत्य को अपनाइए, समानता को स्वीकार कीजिए और मानवता को जीवन का आधार बनाइए — यही सतनाम का सार है।”

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