अपनी गोदी में जो जलाएँ, अपने ही संतानों को।
होलिका का रूप वही हैं, पूछो मत अंजानों को।।
ईर्ष्या-धूम में आँख जले, मन हो जाता काला है।
फिर कहते हैं भाग्य बुरा है, जग सारा ही ज्वाला है।।
प्रह्लाद की भूल यही थी-हरि-नाम जपते जाते।
सत्ता के मद में डूबे जन, सच को कैसे सह पाते?
निर्दोषों पर क्रोध बरसता, यह कैसी अभिलाषा है!
हिरण्यकश्यप हर घर बैठे-बस बदली परिभाषा है।।
जो निज पुत्र न अपना पाए, जग का हित क्या साधेगा?
वंश-वृक्ष की जड़ ही सूखी, फल किस डाली बाँधेगा?
स्तंभ-स्तंभ में सत्य खड़ा है, पर हम देख न पाते हैं|
नरसिंह बाहर ढूँढ रहे हैं, भीतर क्यों न आते हैं?
होली आई, दहन हुआ-पर मन का दाह न जल पाया।
प्रह्लाद-भाव बिसरा बैठे, बस रंगों ने छल खाया।।
हम होलिका तो जला रहे, पर जलन न हृदय से जाती।
प्रह्लाद-भाव भुला बैठे, बस फूहड़ वाणी गाती।।
आओ इस होली संकल्प लें-
अंतर की होलिका जल जाए,
प्रह्लाद-सा निष्कपट विश्वास
हर श्वास-श्वास में पल जाए।।
ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'

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