राष्ट्र की देह
राष्ट्र का अन्न
हवा, पानी और निर्मलाकाश
बचने को छत
सुरक्षा, अधिकार और चुनने की छूट
हम नागरिक देश के
लोकतंत्र की सीढियाँ
संवाद की स्वतंत्रता
कहन का अधिकार
अभिव्यक्ति को सुविधा देता तंत्र
बोध का संविधान
हम नागरिक देश के
हमारी माँगें
हमारी मुसीबतें
हमारे मूलाधिकार
धरना, अनशन, प्रदर्शन और आलोचनाएँ
वापस भेज देने की चिंगारी
हम नागरिक देश के
किन्तु कर्तव्य!
क्या यह माँग की राह का रोड़ा?
भाव ऐसे हमारे
ज्यों खुद के सिर पर हथौड़ा
कर्तव्यों के प्रति नितान्त उदासीन
हम नागरिक देश के
देयता मनुष्य की मौलिकता है
और पाना है--
दिये गए सागर से एक लोटा निकालना
देने से पात्र भरता है
उदाहरण से भविष्य की राह बनती है
क्या हैं हम ऐसे नागरिक देश के?
निर्माण है सतत प्रक्रिया
है यह तपश्चर्या
कर्तव्य व कर्म से सधता है देश
इतनीं भर इसकी साधना
तो क्या हम मूल कर्तव्य की ओर चलेंगे
क्या हम बनेंगे ऐसे नागरिक देश के?
महत्वपूर्ण है हमने क्या छोड़ा विरासत में
संस्कार, बोध, तरीके सभ्य मनुष्य के
आचरण किसी सच्चे इंसान के;
पीढ़ियों में रोपने होते हैं
रोपनी को चाहिए पौधा
क्या हम स्वयं बनेंगे पौधे इस देश के?
कर्तव्य से अधिकार खुद ब खुद मिलते हैं
अन्न, जल, हवा, आकाश और यह धरती
हमारे लिए सम्बोधन है इस राष्ट्र का
क्या हम इस सम्बोधन में उतरेंगे
क्या लौटा सकेंगे इस राष्ट्र को उसका हिस्सा
क्या हम बनेंगे ऐसे नागरिक देश के?
ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'
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