विडंबना! जहाँ से निकले प्रदेश के कई 'प्रशासनिक स्तंभ', आज वह गांव खुद बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है*
शक्ति जिला मुख्यालय से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह किरारी ( बाराद्वार ) गांव आज एक दर्दनाक दौर से गुजर रहा है। यह वही गांव है, जिसने छत्तीसगढ़ शासन को कई होनहार प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी दिए। यहाँ के युवाओं ने अपनी मेहनत से प्रदेश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन आज उन्हीं का गांव 'वीरान' होने की कगार पर है।
सबसे बड़ी समस्या: जर्जर और नदारद सड़कें
एक ओर हम विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय के इतना करीब होने के बावजूद किरारी बाराद्वार गांव में सड़कों की सुविधा न होना सबसे बड़ी कमी बनकर उभरी है।
पलायन की मजबूरी: बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग अपने ही घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
प्रशासनिक अनदेखी: जिस गांव ने प्रशासन को इतने अधिकारी दिए, क्या वहां की सड़कों के लिए प्रशासन के पास बजट या इच्छाशक्ति नहीं है?
विकास की कछुआ चाल: 5 किलोमीटर का सफर भी आज यहाँ के ग्रामीणों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
एक अपील
क्या हमारी पहचान सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेगी? क्या उस माटी का कोई कर्ज नहीं, जिसने प्रदेश को काबिल अफसर दिए?
शासन-प्रशासन से विनम्र निवेदन है कि इस गांव की सुध ली जाए। यहाँ सड़कें सिर्फ डामर की पट्टी नहीं, बल्कि इस गांव के अस्तित्व को बचाने की लाइफलाइन हैं। अगर जल्द ही ध्यान नहीं दिया गया, तो प्रतिभाओं को जन्म देने वाली यह कोख सचमुच वीरान हो जाएगी।

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