*सन् 1992 में थाना प्रभारी द्वारा लगभग 20- 25 आदिवासी /समाज सेवको को नक्सलवादी बता कर जेल में बंद कर दिया गया। जिसमें से एक आदिवासी समाज सेवक लीडर रामनाथ नागवंशी को अपने सर्विस रिवॉल्वर(बंदूक) से जान से मार दिया गया।जिसका क्षतिपूर्ति 1 करोड़ मुआवजा राशि परिजन को दिलाने हेतु छ.ग.मानव अधिकार JJF के प्रदेश अध्यक्ष सी0एस 0चौहान(अधिवक्ता छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट) ने माननीय हाई कोर्ट में प्रकरण दायर किया।जिसमें मान.न्यायालय ने मुआवजा राशि 45 दिवस में देने हेतु कलेक्टर को आदेशित किया।*
साइंस वाणी न्यूज़ रायगढ़ प्राप्त जानकारी के अनुसार:- जिला जशपुर,थाना कासाबेल अंतर्गत सन् 1992 के प्रसिद्ध मामला "डेंगूरजोर आदिवासी हत्याकांड" आज भी सब के दिल में जीवित है।क्योंकि यह मामला दिल को झंझोर देने वाला है।
थाना प्रभारी द्वारा पूरे बस्ती के आदिवासी(पुरुष)समाज सेवक को नक्सलवादी बता कर बस से थाना लेकर थर्ड डिग्री टॉर्चर किया जिससे आदिवासी मरने के कगार पर हो गए तब दूसरे दिन बस में डालकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ले जाया गया इस बीच में ही गिरफ्तार किए गए आदिवासियों के माता-पिता, पत्नी एवं बच्चों द्वारा बस को रोका गया।और पुलिस कर्मियों से हाथ जोड़कर निवेदन किया गया।कि हमें हमारे परिवार वालों से मिलने दो तभी थाना प्रभारी एवं अन्य 05 पुलिस कर्मियों द्वारा आदिवासीयो के परिवार जनों को लाठी,बेल्ट लोहे के रॉड,हाथ मुक्का से जान लेवा प्रहार करने लगे एवं महिलाओं के कपड़ा फाड़े गए।
तभी आदिवासी के मुख्य लीडर रामनाथ सूर्यवंशी द्वारा पुलिस कर्मियों को बोला गया कि मेरी मां,पिताजी को क्यों मार रहे हो। मारना है तो मुझे मारो तभी बोलते ही थाना प्रभारी एच0आर0अहिरवार ने रामनाथ नागवंशी को अपने सर्विस रिवाल्वर/बंदूक से सीने पर वार करते ही रामनाथ नागवंशी वहीं पर दम तोड़ दिया।
पुलिस कर्मियों का अत्याचार फिर भी नहीं रुका। उन्होंने रामनाथ नागवंशी के शव को उनके परिवार जन को न देकर साक्ष्य को छुपाने के लिए अपने साथ लेकर आग से जला दिया।
जबकि रामनाथ नागवंशी ईसाई धर्म के अंतर्गत आते हैं उनके धर्म के अनुसार मिट्टी में दफनाया जाता है।बुजुर्ग का माता-पिता, पत्नी,बच्चे को अंतिम संस्कार का मौका भी नहीं दिया गया।
इसके पश्चात मृतक रामनाथ सूर्यवंशी के छोटे भाई रीमनाथ सूर्यवंशी द्वारा जिला न्यायालय जशपुर में भारतीय दंड संहिता की धारा 200 एवं 202 के तहत परिवाद दायर किया गया। न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए समस्त गिरफ्तार आदिवासियों का बयान लिया एवं मामला का अवलोकन किया इसके पश्चात न्यायालय ने पाया कि आदिवासियों के साथ बहुत ज्यादा अत्याचार किया गया है।तब न्यायालय ने प्रकरण क्रमांक सेशन केस 211/1997 रजिस्टर्ड कर धारा 302,323, व अन्य धाराये दर्ज किया। साथ ही थानेदार एवं अन्य पुलिसकर्मियों को नोटिस जारी किया।
तत्पश्चात थानेदार एवं अन्य पुलिसकर्मि अपना पक्ष रखें जिसमें न्यायालय के ट्रायल में न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों का अवलोकन कर थानेदार पर लगाए गए धारा 302 को 304 में बदलकर 5 साल का सश्रम कारावास एवं 500 रु जुर्माना से दंडित किया।एवं 05 अन्य पुलिसकर्मियों को 323 धारा से दंडित किया।
मृतक परिवार भीख मांगने के लिए मजबूर होकर दर-दर भटकने लगा। और अपना आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 1992 से 2025 तक संघर्ष करते रहे। लेकिन फिर भी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं आया।तभी मुलाकात छत्तीसगढ़ मानवाधिकार jjf के प्रदेश अध्यक्ष- सी0एस0चौहान(अधिवक्ता- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट) से हुई।उन्होंने मामला को तत्काल संज्ञान में लेते हुए कलेक्टर जशपुर,पुलिस अधीक्षक जशपुर,पुलिस मुख्यालय रायपुर एवं अन्य कार्यालय में पत्राचार के माध्यम से 1 करोड़ मुआवजा/क्षति पूर्ति राशि का मांग किये। जिसमें किसी प्रकार के कोई कार्यवाही नहीं होने की स्थिति में माननीय चौहान ने हाई कोर्ट बिलासपुर में रीट याचिका दायर किया।जिसमें माननीय न्यायालय ने प्रकरण को गहराई से लेते हुए 45 दिवस में मुआवजा राशि देने के लिए कलेक्टर को आदेशित किया।
हेमंत कुमार टंडन
जिला ब्यूरो चीफ रायगढ़ छत्तीसगढ़
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