जागो बहना ! काल पुकारे, रण का वेला आई है।
धधक उठी धरती की छाती, नभ ने हुंकार सुनाई है।।
तुम ज्वाला की जन्मी चिंगारी, तेज-तपन की धारा हो।
भीतर सोई शक्ति जगाओ, तुम ही काल-कटारा हो।।
जब उन्मत्त हुआ महिषासुर, छाया घोर अँधेरा था।
सिंह-विहंगिनी बन प्रकटित, तुमने तम को फेरा था।।
स्मरण करो वह सिंह-गर्जना, वह ज्वाला बलिदानी थी।
जब रानी लक्ष्मीबाई की, तलवार स्वयं तूफ़ानी थी।।
श्रृंगार तुम्हारा चंद्र-प्रभा, कोमलता का गान सही।
पर संकट में वज्र बनो तुम- यह ही नारी-मान सही।।
निज रक्षा ही प्रथम धर्म है, यह दृढ़ संकल्प उठाओ अब।
अन्यायों के वक्षस्थल पर, सत्य-विजय लिख जाओ अब ।।
दीप्त दिवस बन प्रकट हो जाओ, तम का अंत करो बहना।
रणभूमि फिर बुला रही है- पहचानो निज चेतन-गहना।।
ऋचा चंद्राकर "तत्वाकांक्षी"
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