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हरी खाद से बदल रही खेती की तस्वीर: कम लागत, ज्यादा मुनाफा और बेहतर मिट्टी की सेहत*लैलूंगा के किसान जतिराम 22 वर्षों से अपना रहे जैविक तरीका, दूसरे किसानों के लिए बने प्रेरणा


*रासायनिक खाद पर घटती निर्भरता, हरी खाद की ओर बढ़ रहा किसानों का रुझान

*“यूरिया-डीएपी छोड़बो, हरी खाद बुआई करबो” बन रहा किसानों का नया संकल्प*

*खरीफ से पहले 15 मई के बाद हरी खाद बुआई की सलाह, 2000 एकड़ का लक्ष्य*

रायगढ़, 05 अप्रैल 2026। जिले में हरी खाद आधारित खेती अब किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है। यह पद्धति न केवल मिट्टी की सेहत सुधार रही है, बल्कि कम लागत में बेहतर मुनाफा भी दे रही है। प्राकृतिक और टिकाऊ खेती की ओर किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है। लैलूंगा विकासखंड के प्रगतिशील किसान जतिराम भगत पिछले 22 वर्षों से हरी खाद आधारित खेती कर रहे हैं। उनका अनुभव बताता है कि शुरुआत में उत्पादन थोड़ा कम लग सकता है, लेकिन समय के साथ मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने पर उत्पादन बेहतर और स्थायी हो जाता है। वे मूंग, ढैंचा और सनई जैसी फसलों का उपयोग हरी खाद के रूप में करते हैं, जिससे मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं और जमीन अधिक उपजाऊ बनती है। इस वर्ष उन्होंने 2 एकड़ में श्री विधि और लाइन कतार पद्धति अपनाकर खेती की, जिससे उन्हें प्रति एकड़ लगभग 15 क्विंटल धान उत्पादन प्राप्त हुआ और लगभग 9 क्विंटल चावल मिला। लागत 15,000 रुपए से 20,000 रूपये प्रति एकड़ रही, जबकि शुद्ध मुनाफा लगभग 80,000 रूपये तक पहुंचा।
       कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यदि किसान पूरी तरह जैविक खेती करना चाहते हैं और रासायनिक उर्वरकों से बचना चाहते हैं, तो हरी खाद सबसे बेहतर विकल्प है। खरीफ सीजन में धान की रोपाई से पहले 15 मई के बाद खेतों में हरी खाद की बुआई करना उपयुक्त समय माना जाता है। हरी खाद के लिए किसान सन (सनई), ढैंचा और मूंग जैसी फसलों का उपयोग कर सकते हैं। जब ये फसलें 45 से 50 दिन की हो जाती हैं, तब इन्हें खेत में ही जोतकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इससे मिट्टी में जैविक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और यूरिया एवं डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता काफी हद तक समाप्त हो जाती है। साथ ही उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता और जमीन की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। लैलूंगा विकासखंड में हरी खाद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। कृषि विभाग ने आगामी खरीफ सीजन में 2000 एकड़ में हरी खाद की बुआई कराने का लक्ष्य रखा है। हरी खाद आधारित खेती आज किसानों के लिए एक टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है। यह न केवल आय बढ़ा रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को सुरक्षित और उपजाऊ बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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