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संविधान का उद्देश्य: व्यक्ति नहीं, व्यवस्था सर्वोपरि—विचार गोष्ठी में उठे अहम सवाल



संवाददाता: श्री निवास मिश्रा, मैहर

मैहर। संविधान की भूमिका, उद्देश्य और उसकी प्रभावशीलता को लेकर एक बार फिर वैचारिक बहस तेज हो गई है। इसी क्रम में अधिवक्ता एवं संविधान जागरूकता मंच के संयोजक रोहिणी प्रसाद तिवारी द्वारा प्रस्तुत विचारों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या संविधान केवल आदर्श परिस्थितियों के लिए बना है या वह विपरीत परिस्थितियों में भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए।

तिवारी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी संविधान का मूल्य केवल उसके प्रावधानों में नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य में निहित होता है। उनका कहना है कि संविधान का मूल उद्देश्य केवल शासन व्यवस्था चलाना नहीं, बल्कि सत्ता पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।

उन्होंने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिए गए ऐतिहासिक वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि उसे संचालित करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं तो वह प्रभावी नहीं हो पाएगा। वहीं, यदि संचालक ईमानदार और जिम्मेदार हों, तो सीमित संसाधनों वाला संविधान भी बेहतर परिणाम दे सकता है।

हालांकि तिवारी ने इस विचार के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा किया कि यदि संविधान की सफलता पूरी तरह व्यक्तियों के चरित्र पर निर्भर हो जाए, तो संविधान की भूमिका सीमित हो जाती है। उन्होंने कहा कि संविधान का निर्माण ही इस उद्देश्य से किया जाता है कि वह व्यक्ति की मनमानी पर अंकुश लगाए और सत्ता के दुरुपयोग को रोके।

अपने वक्तव्य में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संवैधानिक विचारकों के दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कई विद्वानों ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान का कार्य केवल सत्ता का संगठन करना नहीं, बल्कि उसे सीमित करना भी है। इसी संदर्भ में यह सिद्धांत सामने रखा गया कि संविधान का उद्देश्य केवल अच्छे लोगों को शासन करने में सक्षम बनाना नहीं, बल्कि बुरे लोगों को भी गलत शासन करने से रोकना है।

तिवारी ने अमेरिकी संवैधानिक विचारक जेम्स मैडिसन के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मनुष्य पूर्णतः आदर्श होते, तो सरकार की आवश्यकता ही नहीं होती। लेकिन चूँकि ऐसा नहीं है, इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जो सत्ता पर नियंत्रण रख सके और जवाबदेही सुनिश्चित करे।

उन्होंने आगे कहा कि एक प्रभावी संविधान वही है जो किसी भी परिस्थिति में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। यदि किसी देश में संविधान होने के बावजूद भ्रष्टाचार, अपराध, असमानता और संस्थागत जवाबदेही की कमी बनी रहती है, तो यह केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस संवैधानिक ढांचे की भी समीक्षा का विषय बन जाता है।

तिवारी के अनुसार, समय के साथ संविधान की समीक्षा और आवश्यक सुधार करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान का अंतिम उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, सत्ता के संतुलन और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना है।

इस प्रकार, संविधान की उपयोगिता और उसकी प्रभावशीलता को लेकर यह बहस एक बार फिर प्रासंगिक हो गई है, जो लोकतंत्र की मजबूती और पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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