यात्राएँ केवल पथ पर बढ़ते कदमों की गिनती नहीं होतीं,
वे भीतर के मौन को अर्थ देने की प्रक्रिया होती हैं।
जो आँखें देखती हैं, वह क्षणिक होता है—
पर जो मन ग्रहण करता है, वही स्थायी अनुभव बन जाता है।
हम दोनों तैयार होकर निकल पड़े। शीत ऋतु की वह सुबह अत्यंत मनोहर थी। हल्की धूप की किरणें धरती को आलोकित कर रही थीं, शीतल हवा गालों को स्पर्श कर रही थी, और मार्ग के दोनों ओर फैली हरियाली मन को प्रसन्न कर रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति स्वयं हमारी यात्रा की सहयात्री बन गई हो।
रास्ते में रंग बिरंगे टेडी बियर की दुकान दिखी। मुक्ता का मन तुरंत वहाँ ठहर गया। उसने एक बड़े, मुलायम पांडा को चुना। पर उसे साथ ले जाना संभव नहीं था। तब उसने विक्रेता को थोड़ी राशि देकर शाम तक उसे सुरक्षित रखने को कहा। उस क्षण मेरे मन में एक विचार आया—
"विश्वास भी कितना विचित्र है—कभी कुछ सिक्कों में मिल जाता है, और कभी पूरी उम्र देने पर भी नहीं मिलता।"
और फिर एक हल्की मुस्कान के साथ यह भी लगा—
"यदि थोड़े से मूल्य में कोई शाम तक ठहर सकता है, तो क्या अधिक मूल्य पर संबंध और लंबा ठहर सकते हैं?"
कुछ ही समय बाद हम मुक्तांगन पहुँचे, जहाँ उत्सव का आयोजन हो रहा था। प्रवेश द्वार पर सुसज्जित अक्षरों में “साहित्य उत्सव” लिखा हुआ था। चारों ओर हरियाली, सुंदर सजावट और मधुर संगीत वातावरण को और भी आकर्षक बना रहे थे। भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो हम किसी साहित्यिक लोक में प्रवेश कर गए हों।
विभिन्न मंडप महान साहित्यकारों के नाम पर सुसज्जित थे—जयशंकर प्रसाद, गजानन माधव मुक्तिबोध, विनोद कुमार शुक्ल आदि। हमें मुक्तिबोध मंडप में अपनी प्रस्तुति देनी थी। मार्ग में अन्य मंडपों की झलकियाँ देखकर मन बार-बार ठहर जाने को कहता, पर समय की मर्यादा हमें आगे बढ़ाती रही।
मंडप में पहुँचते ही काव्य पाठ प्रारंभ हो चुका था। मेरा नाम पुकारा गया और मैंने मंच पर जाकर प्रस्तुति दी। श्रोताओं की तालियों और सराहना ने मन को स्पर्श किया। मुक्ता मुझे देख रही थी—
"जैसे मेरी हर पंक्ति उसके भीतर भी गूँज रही हो—वह केवल दर्शक नहीं, मेरी यात्रा की साक्षी थी।"
इसके पश्चात हम विभिन्न स्टॉलों की ओर बढ़े। छत्तीसगढ़ी परिधान, आभूषण और हस्तशिल्प की वस्तुएँ अत्यंत आकर्षक थीं। मैंने एक दर्पण खरीदा। दर्पण केवल चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मदर्शन का प्रतीक भी है—
"यह हमें बाहरी रूप के साथ-साथ भीतर झाँकने का भी संकेत देता है।"
बुक स्टॉल पर पहुँचते ही मन प्रफुल्लित हो उठा। पुस्तकों की सुगंध और ज्ञान का विस्तार वहाँ स्पष्ट अनुभव हो रहा था। मैंने राहुल सांकृत्यायन की संस्कृति के चार अध्याय खरीदी। वहाँ उपस्थित साहित्यकारों से मिलना और उनके अनुभव सुनना अत्यंत प्रेरणादायक रहा।
फिर हम जयशंकर प्रसाद मंडप पहुंचे, जहाँ विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकार अपने विचार रख रहे थे। यही इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण भाग था।
एक साहित्यकार जब बोल रहे थे, तो उनके शब्द केवल शब्द नहीं थे—वे अनुभवों की परतें खोल रहे थे। उन्होंने कथा साहित्य की गहराइयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया मानो हर पात्र हमारे सामने जीवित हो।
एक अन्य वक्ता ने आधुनिक समय, तकनीक और साहित्य के संबंध पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि—
"समय बदलता है, साधन बदलते हैं, पर संवेदनाएँ वही रहती हैं; साहित्य उन्हीं संवेदनाओं का कालजयी स्वर है।"
उनकी वाणी में गंभीरता थी, पर साथ ही एक अपनापन भी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वे केवल मंच से नहीं, सीधे हमारे भीतर संवाद कर रहे हों।
"उनका हर शब्द मन की किसी परत को छूता, और भीतर एक नई सोच को जन्म देता जा रहा था।"
मैं पूरी तन्मयता से उन्हें सुन रही थी, जबकि मुक्ता बीच-बीच में चना चाट का आनंद ले रही थी।
"उसके लिए उस क्षण का स्वाद महत्वपूर्ण था, और मेरे लिए शब्दों का—यही हमारे स्वभाव का अंतर भी था और हमारी मित्रता का संतुलन भी।"
धीरे-धीरे समय बीतता गया। कई मंडप अभी शेष थे, पर लौटना आवश्यक था। मन वहीं रुक जाना चाहता था, पर कदमों को लौटना ही था।
संध्या का समय था। अस्त होता सूर्य आकाश को लालिमा से भर रहा था। ठंडी हवा दिनभर की थकान को सहला रही थी। पेड़ों की छायाएँ लंबी हो गई थीं, और पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो—
"हर यात्रा केवल स्थानों की नहीं होती, कुछ यात्राएँ भीतर के संसार को भी विस्तृत कर जाती हैं।"
भीड़ थी,
पर एकांत स्पष्ट था।
शब्द बोले जा रहे थे—
और अर्थ
चुपचाप उतर रहे थे।
ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'
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