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विक्रमखोल शिलालेख विलुप्ति के कगार पर: ओड़िया भाषा को शास्त्रीय दर्जा दिलाने का प्रमुख आधार


झारसुगुड़ा: ओड़िया भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण की बातें हर जगह कही जा रही हैं, लेकिन जिस प्रमुख आधार के कारण ओड़िया भाषा को शास्त्रीय दर्जा मिला, वही अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। ओड़िया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने में सबसे प्राचीन प्रमाण के रूप में झारसुगुड़ा जिले के लखनपुर ब्लॉक स्थित विक्रमखोल के शिलालेख का उल्लेख किया गया था। हालांकि, संरक्षण के अभाव में अब यह शिलालेख पढ़ने योग्य स्थिति में नहीं रहा है, जिससे बुद्धिजीवियों में चिंता और रोष देखा जा रहा है।

बेलपहाड़ शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर ग्रिंडोला के पास स्थित विक्रमखोल पहाड़ी गुफा में प्रागैतिहासिक काल का यह शिलालेख दशकों से शोध का विषय रहा है। वर्ष 1930 में इतिहासकार डॉ. के.पी. जायसवाल ने इसकी खोज की थी और इसे ईसा पूर्व 15वीं शताब्दी का बताया था। उनका मानना था कि यह शिलालेख हड़प्पा और ब्राह्मी लिपि के बीच के कालखंड का है।

बाद में ओड़िया भाषा को शास्त्रीय दर्जा दिलाने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्तुत “शास्त्रीय ओड़िया” नामक शोध पुस्तक में भी इस शिलालेख को शामिल किया गया। शोधकर्ता देवीप्रसन्न पटनायक और डॉ. सुब्रत कुमार पृष्टि ने इसे सिंधु सभ्यता से भी अधिक प्राचीन बताया है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विश्व में किसी एक गुफा में इतनी बड़ी संख्या में शिलालेख मिलना अत्यंत दुर्लभ है।

करीब 35 फीट लंबी और 7 फीट चौड़ी चट्टान पर उकेरे गए इस शिलालेख पर अब तक विस्तृत और निश्चित शोध नहीं हो सका है। डॉ. पृष्टि के अनुसार इसमें तीन पंक्तियों में कुल 42 अक्षर अंकित हैं।

हालांकि 1930 में लिए गए इसके फोटो आज भी संग्रहालय में सुरक्षित हैं, लेकिन वर्तमान में विक्रमखोल का शिलालेख धूप और बारिश के कारण लगभग मिट चुका है। इसके संरक्षण के लिए बार-बार मांग उठने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यहां तक कि स्थल तक पहुंचने के लिए उचित सड़क भी नहीं बनाई गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से केवल कुछ सूचना बोर्ड लगाकर औपचारिकता पूरी कर दी गई है।

ओड़िया अस्मिता के इस महत्वपूर्ण प्रतीक को बचाने के लिए अब तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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