खरसिया अडानी और भाटिया राजेंद्र कोलवॉशरी की मनमानी से फूटा ग्रामीणों का गुस्सा मासूमों का निवाला तक हुआ जहरीला, सड़क बनी मौत का जाल! अब सड़क नहीं बनी तो होगा महाआंदोलन
*खरसिया* ब्लॉक के नवागांव, पामगढ़, राजघट्टा, छोटे डूमरपाली और बड़े डूमरपाली के ग्रामीण आज ऐसी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं, जहां हर दिन धूल, बीमारी, डर और हादसों के बीच गुजर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि राजघट्टा ग्राम पंचायत में स्थित भाटिया राजेंद्र कोलवॉशरी कंपनी और बड़े डूमरपाली में संचालित अडानी रेलवे साइडिंग से निकलने वाले भारी-भरकम हाइवा वाहनों ने पूरे इलाके की जिंदगी तबाह कर दी है।
दिन-रात दौड़ती सैकड़ों गाड़ियों ने सड़क को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। सड़क अब सड़क नहीं, बल्कि गड्ढों और धूल का ऐसा जाल बन चुकी है, जहां हर कदम पर हादसे का खतरा मंडराता है। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियों के लिए यह सिर्फ कोयला ढुलाई का रास्ता होगा, लेकिन गांव वालों के लिए यही रास्ता अब “मौत का रास्ता” बन चुका है।
“सुबह उठते हैं तो पानी में धूल, खाना खाते हैं तो निवाले में धूल”
ग्रामीणों की पीड़ा सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। लोगों का कहना है कि सुबह घर में रखे पानी के बर्तनों तक में धूल की परत जमी रहती है। खाने-पीने की चीजें, कपड़े, घर का सामान — सब कुछ धूल से पट जाता है। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इस जहरीले प्रदूषण की चपेट में हैं।
लगातार उड़ती डस्ट के कारण गांवों में दमा, खांसी और सांस संबंधी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनियों को सिर्फ मुनाफे से मतलब है, गांव वालों की जिंदगी से नहीं।
“बच्चों के मध्यान भोजन तक में गिर रही धूल
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि गांव के स्कूल भी इस प्रदूषण से नहीं बच पाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, स्कूलों में बनने वाले मध्यान भोजन तक में धूल गिर रही है। मजबूरी में मासूम बच्चे वही दूषित भोजन खाने को मजबूर हैं।
सोचने वाली बात यह है कि जिन बच्चों को पोषण देने के लिए मध्यान भोजन योजना चलाई जा रही है, वही भोजन अब धूल और प्रदूषण से जहरीला होता जा रहा है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
*बारिश में सड़क नहीं, कीचड़ और फिसलन का नरक*
गर्मी में धूल से हाल बेहाल रहता है, तो बारिश में यही सड़क दलदल बन जाती है। सड़क पर फैला कोल डस्ट और कीचड़ इतनी फिसलन पैदा करता है कि लोग आए दिन गिरकर घायल हो रहे हैं। जगह-जगह बने गहरे गड्ढे दुर्घटनाओं को खुला न्योता दे रहे हैं।
स्कूल जाने वाले बच्चों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। बच्चों की ड्रेस कीचड़ से खराब हो जाती है, कई बच्चे डर के कारण स्कूल जाने से कतराने लगे हैं। अभिभावकों को हर पल डर सताता है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए।
“ *नेता आए, धरना हुआ, आश्वासन मिला… लेकिन सड़क आज भी टूटी पड़ी है”*
ग्रामीणों ने बताया कि इस समस्या को लेकर कई बार चक्का जाम और धरना-प्रदर्शन किया गया। भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने भी आंदोलन किए, लेकिन कंपनियों पर कोई असर नहीं पड़ा। हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे कंपनियां प्रशासन और नेताओं से भी बड़ी हो गई हैं, क्योंकि वर्षों बाद भी सड़क निर्माण और धूल नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
*अब ग्रामीणों की चेतावनी — “इस बार होगी आर-पार की लड़ाई”*
अब गांव वालों का सब्र टूट चुका है। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस बार सड़क निर्माण और धूल नियंत्रण की व्यवस्था नहीं हुई, तो बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा। लोगों का कहना है कि अब केवल धरना नहीं होगा, बल्कि “आर-पार की लड़ाई” लड़ी जाएगी और सड़क बनने तक आंदोलन जारी रहेगा।
*अब सबसे बड़ा सवाल यही है* —
क्या कंपनियों के मुनाफे के आगे गांव वालों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
क्या मासूम बच्चों को धूल और बीमारी के बीच जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
और आखिर कब जागेगा प्रशासन?








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