गरीबी में आटा गीला,
हिन्दी म कहावत हेl
ठउको ओ गोठ ह देख,
हमर उपर आवत हेl
नून घलो नोहर होगे,
बासी नइ मिठावत हेl
देख दार हे महँगा भारी,
चूल्हा ह गूँगवावत हेl
दू जऊर के भात साग बर,
दिन भर देख कल्लावत हेl
नइ मिले जेन दिन बुता,
पोटा ह अटियावत हेl
रोज कमाथन तभे खाथन,
समारू हाल बतावत हेl
अपन हाल म रोवत हँवय,
दरद ल अपन लुकावत हेl
मजदूर दिवस कहिके सब्बो,
देखव आज चिल्लावत हेl
एक दिन बस मया देखाके,
हमर हाँसी उड़ावत हेl
लोको पायलट-संतोष मिरी 'हेम'
कोरबा (छत्तीसगढ़)
********************************
*मजदूर* (कुण्डलिनी)
सपना पूरा आपका, करता है मजदूर।
तरसे फिर भी अन्न को, कितना है मजबूर।।
कितना है मजबूर, नहीं है कोई अपना।
साथ नहीं धन घान, हृदय में कोरा सपना।।
लोको पायलट-संतोष मिरी 'हेम'
कोरबा (छत्तीसगढ़)
**********************************
*मजदूरों की दशा* (सार छंद गीत)
मजदूरों की दशा देखकर, हृदय आज अकुलाया l
नितदिन उनका शोषण करके, सबने उन्हें सताया ll
कभी समय पर देख श्रमिक को, नहीं मिले मजदूरीl
फिर भी देखो काम करे वह, उनकी है मजबूरी ll
काम करे तब ही घर चलता, तब ही रोटी खाया l
मजदूरों की दशा देखकर, हृदय आज अकुलाया ll
रक्त बहे लथपथ हो जाते, फिर भी जान लगाते l
स्वयं बिना घर के वह देखो, सबके महल बनाते ll
देख आपका सुंदर सपना, उसने आज सजाया l
मजदूरों की दशा देखकर, हृदय आज अकुलाया ll
करते ठेकेदार तंग हैं, ठगकर काम कराते l
काट छांट कर धन वह देते, बांकी सब खा जाते ll
लगा डांट फटकार सभी को, उसने है भरमाया l
मजदूरों की दशा देखकर, हृदय आज अकुलाया ll
मंदिर मस्जिद गिरजाघर में, श्रम का भोग चढ़ाते l
कभी नहीं वह थककर रुकते, नव निर्माण कराते ll
जीवन यापन कर मुश्किल से, उदर शांत कर पाया l
मजदूरों की दशा देखकर, हृदय आज अकुलाया ll
**********************************
*बुद्ध पूर्णिमा* (एकावली छंद)
आज है, पूर्णिमा ।
देख लो, चंद्रमा।।
शीत सा, है लहर।
शांति का, है डगर।।
बुद्ध ने, ध्यान से।
सत्य के, ज्ञान से।।
ईश को, पा लिया।
ज्ञान को, है दिया।।
राह पर, चल सदा।
दे गए , बल सदा।।
है जला, ज्योत भी।
ज्ञान के, स्त्रोत भी।।
चित्त से, कर मनन।
शांत हो, देख मन।।
बुद्ध को, कर नमन।
तब मिले, ज्ञान धन।।
लोको पायलट-संतोष मिरी 'हेम'
कोरबा (छत्तीसगढ़)
*******************************
टिप्पणियाँ