“₹30 की जगह ₹300 तक वसूली!”ललितपुर में जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र बनवाने के नाम पर जनता से खुलेआम लूट?सरकार ने तय की फीस, फिर भी सीएससी सेंटरों पर मनमानी जारी — गरीब, छात्र और मजदूर सबसे ज्यादा परेशान
ललितपुर। डिजिटल इंडिया और जनसेवा की योजनाओं को लेकर सरकार लगातार दावे कर रही है कि आम जनता को पारदर्शी और सस्ती ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। जनपद ललितपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में संचालित सीएससी (कॉमन सर्विस सेंटर) और जन सेवा केंद्रों पर जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र बनवाने के नाम पर गरीब और जरूरतमंद लोगों से मनमाने तरीके से अवैध वसूली किए जाने के आरोप तेजी से सामने आ रहे हैं।
सरकारी नियमों के अनुसार ई-डिस्ट्रिक्ट एवं ई-साथी पोर्टल के माध्यम से जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र के लिए निर्धारित शुल्क लगभग ₹15 है, जबकि सीएससी केंद्रों के माध्यम से सेवा शुल्क जोड़कर लगभग ₹30 तक फीस तय मानी जाती है। इसके बावजूद कई स्थानों पर लोगों से ₹100, ₹200 यहां तक कि ₹300 तक वसूले जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन ने फीस तय कर रखी है तो आखिर अतिरिक्त वसूली किसके संरक्षण में हो रही है? और जिम्मेदार विभाग अब तक मौन क्यों हैं?
ग्रामीण और गरीब वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र आज के समय में सिर्फ कागज नहीं बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़े अहम दस्तावेज बन चुके हैं। छात्रवृत्ति, सरकारी नौकरी, राशन कार्ड, पेंशन, आवास योजना, स्कूल-कॉलेज प्रवेश और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए इन प्रमाण पत्रों की आवश्यकता पड़ती है।
ऐसे में सबसे ज्यादा परेशानी गरीब मजदूर, किसान, छात्र और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को उठानी पड़ रही है। कई ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सीएससी सेंटरों पर उनसे आवेदन के नाम पर पहले ₹100 लिए जाते हैं, फिर दस्तावेज अपलोड, प्रिंटिंग, सत्यापन और “जल्दी काम कराने” के नाम पर अलग से पैसे मांगे जाते हैं।
कुछ लोगों का आरोप है कि यदि कोई व्यक्ति निर्धारित शुल्क की बात करता है तो उसे कई दिनों तक दौड़ाया जाता है या फिर आवेदन में त्रुटि बताकर परेशान किया जाता है।
“सरकारी फीस ₹30, लेकिन जनता से वसूली ₹300”
जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं कि कई सीएससी संचालक फीस का कोई बोर्ड तक नहीं लगाते। आम जनता को यह जानकारी ही नहीं होती कि सरकार ने वास्तविक शुल्क कितना निर्धारित किया है। इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर कुछ लोग डिजिटल सेवाओं को कमाई का माध्यम बना चुके हैं।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि हर सीएससी सेंटर पर बड़े अक्षरों में शासन द्वारा निर्धारित शुल्क सूची चस्पा कर दी जाए और नियमित निरीक्षण हो तो अवैध वसूली पर काफी हद तक रोक लग सकती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और ऑनलाइन प्रक्रिया की सीमित जानकारी होने के कारण लोग मजबूरी में अधिक पैसे देने को तैयार हो जाते हैं। कई बुजुर्ग और अशिक्षित लोग तो यह भी नहीं जानते कि उनका आवेदन वास्तव में किस पोर्टल पर किया गया है और वास्तविक फीस क्या है।
छात्रों की जेब पर सबसे ज्यादा असर
वर्तमान समय में कॉलेज प्रवेश, छात्रवृत्ति और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र अनिवार्य हो चुके हैं। ऐसे में हजारों छात्र हर वर्ष इन दस्तावेजों के लिए आवेदन करते हैं।
छात्रों का कहना है कि एक प्रमाण पत्र के लिए ₹150 से ₹200 तक देना पड़ता है। यदि किसी छात्र को तीनों प्रमाण पत्र बनवाने हों तो कुल खर्च ₹500 से ₹700 तक पहुंच जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि बड़ी समस्या बन जाती है।
कई छात्रों ने आरोप लगाया कि सीएससी केंद्रों पर “सर्वर डाउन”, “फाइल रिजेक्ट”, “दस्तावेज गलत” और “ऑनलाइन समस्या” जैसे बहाने बनाकर अतिरिक्त पैसे मांगे जाते हैं। जल्दी प्रमाण पत्र चाहिए तो “तत्काल सेवा” के नाम पर और अधिक वसूली की जाती है।
प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहे सवाल
जनता का कहना है कि यदि जिला प्रशासन समय-समय पर सीएससी केंद्रों की जांच करे तो स्थिति सुधर सकती है। लेकिन लंबे समय से शिकायतें आने के बावजूद कोई बड़ा अभियान या सख्त कार्रवाई सामने नहीं आई है।
लोगों का आरोप है कि कई केंद्र बिना किसी डर के खुलेआम अतिरिक्त शुल्क वसूल रहे हैं। यदि किसी नागरिक द्वारा विरोध किया जाता है तो उसे “जहां शिकायत करनी हो कर दो” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार सीएससी केंद्रों को शासन की गाइडलाइन के अनुसार काम करना होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी की कमी के कारण कई जगह नियमों का पालन नहीं हो पा रहा है।
क्या कहते हैं नियम?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ई-डिस्ट्रिक्ट सेवाओं के लिए निर्धारित शुल्क तय किए गए हैं। इन सेवाओं का उद्देश्य नागरिकों को कम खर्च में ऑनलाइन सुविधाएं उपलब्ध कराना है। नियमों के अनुसार अतिरिक्त वसूली पूरी तरह अनुचित मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई केंद्र निर्धारित शुल्क से अधिक राशि वसूलता है तो उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कर कार्रवाई हो सकती है। लेकिन अधिकांश लोगों को शिकायत प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती।
“डिजिटल सेवा नहीं, मजबूरी का शोषण”
सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार ने डिजिटल इंडिया का सपना जनता की सुविधा के लिए शुरू किया था, लेकिन कुछ लोग इसे जनता के शोषण का माध्यम बना रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोग पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, वहां एक छोटे से प्रमाण पत्र के लिए कई गुना अधिक पैसे वसूलना सीधा अन्याय है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि—
सभी सीएससी केंद्रों पर शुल्क सूची अनिवार्य रूप से लगाई जाए।
प्रत्येक आवेदन की रसीद देना अनिवार्य किया जाए।
अवैध वसूली करने वाले केंद्रों का लाइसेंस निरस्त किया जाए।
जिला स्तर पर हेल्पलाइन नंबर जारी हो।
समय-समय पर प्रशासनिक छापेमारी की जाए।
गरीब और ग्रामीण नागरिकों को जागरूक किया जाए।
जनता पूछ रही — “कार्रवाई कब?”
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रशासन इस मामले में कब जागेगा? यदि सरकार की निर्धारित फीस ₹30 तक है तो फिर जनता से कई गुना अधिक रकम क्यों वसूली जा रही है? क्या जिम्मेदार विभागों को इसकी जानकारी नहीं है या फिर शिकायतों के बावजूद अनदेखी की जा रही है?
ललितपुर की जनता अब चाहती है कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेष जांच अभियान चलाए। लोगों का कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो गरीब और जरूरतमंद नागरिकों का आर्थिक शोषण लगातार जारी रहेगा।
जरूरत पारदर्शिता और सख्ती की
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सेवाओं में पारदर्शिता तभी आएगी जब जनता को वास्तविक शुल्क की जानकारी होगी और प्रशासनिक निगरानी मजबूत होगी। केवल नियम बना देने से व्यवस्था नहीं सुधरती, उसके पालन पर भी सख्ती जरूरी होती है।
यदि प्रशासन चाहे तो एक ही सप्ताह में पूरे जिले के सीएससी केंद्रों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है। लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति और गंभीरता दोनों आवश्यक हैं।
आम जनता से अपील
यदि किसी भी सीएससी या जन सेवा केंद्र पर जाति, आय या निवास प्रमाण पत्र बनवाने के नाम पर निर्धारित शुल्क से अधिक पैसे मांगे जाते हैं तो नागरिक उसकी रसीद अवश्य लें और संबंधित विभाग में शिकायत करें। जागरूकता ही ऐसी अवैध वसूली पर रोक लगाने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है।
अब देखना यह होगा कि ललितपुर प्रशासन जनता की इस गंभीर समस्या पर कितना संवेदनशील रवैया अपनाता है और अवैध वसूली करने वालों पर कब तक कार्रवाई होती है। फिलहाल जनता के बीच एक ही चर्चा है —
“सरकार की सेवा आखिर जनता तक सही रूप में कब पहुंचेगी?”
चरन सिंह प्रभारी उत्तर प्रदेश एवं मनीषा विशेष संवाददाता उत्तर प्रदेश
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