अमृत सरोवर विवाद में नया मोड़: ग्रामीण ने भूमि पर जताया निजी हक, पंचायत की आपत्ति से अधर में लटका मामला
संवाददाता - संतोष कुमार चौहान
साइंस वाणी न्यूज़ धरमजयगढ़
धरमजयगढ़ :- धरमजयगढ़ क्षेत्र के ग्राम सिसरिंगा में अमृत सरोवर को लेकर चल रहा विवाद अब नया मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। अब तक जिस मामले को सरकारी भूमि और अमृत सरोवर निर्माण से जोड़कर देखा जा रहा था, उसकी वास्तविकता धीरे-धीरे सामने आने लगी है। स्थानीय ग्रामीण ने पूरे घटनाक्रम पर अपनी बात रखते हुए कई महत्वपूर्ण दावे किए हैं, जिससे मामला और अधिक उलझता नजर आ रहा है।
ग्रामीण का दावा है कि जिस भूमि को लेकर अमृत सरोवर निर्माण और खुदाई का विवाद खड़ा हुआ है, वह उसकी निजी भूमि खसरा क्रमांक 840/1ग जिसका रकबा 1.489 हेक्टेयर है। उसका कहना है कि इस जमीन पर उसका वर्षों पुराना अधिकार है और इसके समर्थन में उसके पास जरूरी दस्तावेज एवं साक्ष्य भी मौजूद हैं। ग्रामीण के अनुसार संबंधित भूमि किसी शासकीय तालाब की नहीं, बल्कि उसके निजी उपयोग और मछली पालन गतिविधियों से जुड़ी रही है।
खुद की लागत से कराया था तालाब निर्माण
ग्रामीण ने बताया कि पूर्व में उसने स्वयं की लागत और मेहनत से वहां तालाब का निर्माण कराया था। उसने मछली पालन को बढ़ावा देने वाली शासकीय योजना का लाभ लेकर तालाब में मत्स्य पालन का कार्य भी शुरू किया था। शुरुआती दौर में तालाब में पर्याप्त पानी रहा और उत्पादन भी हुआ, लेकिन बाद में पानी का स्रोत सूख जाने के कारण तालाब धीरे-धीरे बेकार हो गया और पूरी तरह सूख गया।
इसी बीच क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य और मिट्टी निकासी के दौरान इस भूमि का मामला सामने आया। जानकारी के अभाव में पंचायत द्वारा कंपनी को कार्य रोकने संबंधी पत्र जारी किया गया, जिसके बाद पूरा मामला अधर में लटक गया। इसका सीधा असर जमीन पर पड़ा और न तो भूमि समतल हो सकी और न ही अपनी पुरानी स्थिति में लौट पाई। ग्रामीण का कहना है कि अब उसकी जमीन खेती योग्य स्थिति से भी बाहर होती जा रही है।
पंचायत की आपत्ति से बढ़ी परेशानी
ग्रामीण ने मांग की है कि यदि भूमि से मिट्टी निकाली गई है तो उसे व्यवस्थित तरीके से समतल किया जाए, ताकि जमीन दोबारा खेती योग्य बन सके। वहीं यदि कार्य आगे नहीं बढ़ाया जाना है तो निकाली गई मिट्टी को वापस भरकर खेत को पहले जैसी स्थिति में लाया जाए।
उसका कहना है कि विवाद, आपत्तियों और प्रशासनिक उलझनों के बीच सबसे ज्यादा नुकसान उसी का हुआ है, जिसकी जमीन महीनों से खराब हालत में पड़ी हुई है।
डीबीएल कंपनी ने दी सफाई
इस पूरे मामले पर Dilip Buildcon Limited (डीबीएल) कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने भी प्रतिक्रिया दी है। अधिकारी के अनुसार कंपनी द्वारा किया जा रहा कार्य ग्रामीण की सहमति, आपसी एग्रीमेंट और अनुमति के आधार पर ही शुरू किया गया था। उनका कहना है कि कंपनी का उद्देश्य भूमि को समतल कर ग्रामीण को राहत पहुंचाना था, लेकिन पंचायत की आपत्ति के बाद कार्य रोकना पड़ा।
कंपनी अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यदि पंचायत की ओर से आपत्ति हटाई जाती है तो कंपनी ग्रामीण द्वारा तय दिन और तारीख के अनुसार तत्काल कार्य शुरू करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि कंपनी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती और स्थानीय सहमति के साथ समाधान निकालने के पक्ष में है।
कई सवालों के घेरे में मामला
अब इस पूरे विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि भूमि वास्तव में निजी है और ग्रामीण के पास उसके दस्तावेज मौजूद हैं, तो बिना पूरी तथ्यात्मक जांच के पंचायत द्वारा आपत्ति क्यों दर्ज की गई? वहीं यदि पंचायत को संदेह था, तो पहले राजस्व अभिलेखों और भूमि की स्थिति की जांच क्यों नहीं की गई?
फिलहाल अमृत सरोवर के नाम पर सामने आया यह विवाद प्रशासन, पंचायत और कंपनी के बीच समन्वय की कमी को उजागर करता दिखाई दे रहा है। वहीं सबसे अधिक परेशानी उस ग्रामीण को झेलनी पड़ रही है, जिसकी जमीन आज भी अधूरी और विवादित स्थिति में पड़ी हुई है।
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