अमरावती में जन्मे स्व० गुणाकर मुले ने एक ‘भारतीय लिपियों की कहानी’ लिखी । उसमें उन्होंने लिखा कि जिस लिपि में यह पुस्तक छपी है, उसे नागरी या देवनागरी लिपि कहते हैं जो लगभग २५० वर्ष पहले बनी। इसके विकास होने से अक्षरों में स्थिरता आ गयी ।
देवनागरी लिपि में मुख्यतः गुजराती, नेपाली, मराठी, संस्कृत, प्राकृत और हिन्दी भाषाएँ लिखी जाती हैं अर्थात हिन्दी तथा इसकी विविध बोलियाँ, संस्कृत एवं नेपाली आदि इसी लिपि में लिखी जाती हैं।
चूँकि हिन्दी भारतीय संस्कृति की आत्मा है इसलिये ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजी ने सन् १९१७/१८ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में सबसे पहले हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता प्रदान कर देने की बात सबके समक्ष रख दी थी। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने के पक्ष में अपने देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरुजी के अलावा अन्य नेता /शिक्षाविद् जैसे पुरुषोत्तम दास टण्डनजी, हिन्दी के दो मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंहजी एवं सेठ गोविन्द दास मालपानीजी जैसे अनेक लोग भी थे।
इन्हीं सबके चलते संविधान सभा ने एकमत से १४ सितम्बर १९४९ को इसे राजभाषा का दर्जा देने पर सहमति जताई थी । तत्पश्चात १९५० में संविधान के अनुच्छेद ३४३(१) के द्वारा हिन्दी को देवनागरी लिपि के रूप में राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।
लेकिन सेठ गोविन्द दास मालपानीजी इस सबके बावजूद हिन्दी भाषा के लिये अपना संघर्ष अनवरत चला रहे थे। वे एकमात्र ऐसे राजनेता थे जिन्होंने हिन्दी भाषा के लिये १९६१ में मिला पद्मभूषण सम्मान तक न केवल लौटाया बल्कि हिन्दी के विकास के लिये सदन में ऐतिहासिक भाषण दिया जिसे हिन्दी के विकास के लिये आज भी *मील का पत्थर* माना जाता है।
अब,चूँकि हिन्दी हमारे देश की राजभाषा है इसी कारण से आजकल प्रशासनिक कार्यों और सरकारी कामकाज के अलावा भी सभी क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग धड़ल्ले से होने लग गया है जिसका बहुत हदतक श्रेय हमारे वर्तमान दृढ़निश्चयी प्रधानमन्त्रीजी को जाता है क्योंकि, जैसा सर्वविदित है, मोदीजी हिन्दी में वार्तालाप ही नहीं करते बल्कि अपने सम्बोधन में भी हिन्दी भाषा को प्रमुखता देते हैं। प्रधानमन्त्री मोदीजी शुरु से ही आज तक विश्व पटल पर हिन्दी का जिस सशक्त तरीके से प्रयोग कर रहे हैं उसी के फलस्वरूप विदेश में न केवल हिन्दी की पैठ बढ़ रही है बल्कि आजकल विदेशी शासनाध्यक्ष हो या अन्य उच्च पदाधिकारी भारतीयों के बीच हिन्दी में ही नमस्कार से सम्बोधन शुरू करते हैंं और उन सभी पदाधिकारीयों को कुछ हिन्दी वाक्यों के माध्यम से सन्देश देने की चेष्टा रहती है। इन्ही सभी कारणों से हम सभी का यही मानना है कि वर्तमान प्रधानमन्त्रीजी हिन्दी को एक अलग तरह की वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैंं, जिसके चलते ही आजकल देश में भी हिन्दी के प्रति लोगों का रुझान में जिस तरह से परिवर्तन देखने में आ रहा हैवह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है साथ ही साथ यह स्थिति हम हिन्दी प्रेमी लोगों को निश्चितरूप से सन्तोष प्रदान करती है ।
उपरोक्त सभी कारणों से यह सुस्थापित है कि आज के इस बदले समय में *राष्ट्रीय एकता में हिन्दी न केवल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है बल्कि विश्व के अनेक भागों में रहने वालों भारतीयों के साथ साथ विश्वस्तरीय नेताओं के भारतीय नेताओं के बीच व्यवहार में भी।*
गोवर्द्धन दास बिन्नाणी 'राजा बाबू '
जय नारायण व्यास काॅलोनी,
बीकानेर
7976870397 / 9829129011 [W]
टिप्पणियाँ